अब भारतीय  प्रतिभाओं की पहली पसंद है जर्मनी
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अब भारतीय  प्रतिभाओं की पहली पसंद है जर्मनी

 राष्ट्रीय दैनिक जागरण                  

अमेरिका की डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल आर्थिक समृद्धि का आधार नहीं है, बल्कि यह वैश्विक तकनीकी नेतृत्व और रणनीतिक प्रभाव का प्रमुख स्तंभ भी है। ट्रम्प वीजा प्रक्रिया को जटिल बनाकर भारतीय प्रतिभाओं को अमेरिका में रोकने की कोशिशें तो कर रहे है लेकिन इससे न केवल अमेरिका की डिजिटल अर्थव्यवस्था बर्बाद हो सकती है बल्कि चीन तकनीकी रूप से अमेरिका से बढत भी हासिल कर लेगा। इन सबके बीच जर्मनी भारतीय आईटी विशेषज्ञों और विद्यार्थियों की स्वाभाविक पसंद हो सकता है। यूरोप की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार जर्मनी का अमेरिका पर भरोसा कम हुआ है तथा वे सॉफ़्टवेयर विकास,क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में अग्रणी बनकर अमेरिका पर से निर्भरता कम करना चाहता है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट,अमेज़न,मेटा,एप्पल और आईबीएम जैसी कंपनियां अमेरिकी डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। ये कंपनियां क्लाउड कंप्यूटिंग,ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया,साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में अग्रणी हैं और वैश्विक स्तर पर तकनीकी मानकों को निर्धारित करती हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्टता पाने के लिए हर देश उच्च-स्तरीय तकनीकी प्रतिभा की तलाश कर रहा है। इस वैश्विक दौड़ में भारतीय आईटी विशेषज्ञों की मांग सबसे ज्यादा हैं। भारत के पास विशाल मानव संसाधन है। हर वर्ष लाखों इंजीनियर और तकनीकी स्नातक तैयार होते हैं,जिनमें से बड़ी संख्या विश्वस्तरीय मानकों पर खरे उतरते हैं। भारतीय आईटी विशेषज्ञ आधुनिक तकनीकों में दक्ष माने जाते हैं। क्लाउड सेवाएं,डेटा साइंस,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में उनकी योग्यता कंपनियों के लिए विशेष आकर्षण का कारण है। लागत और गुणवत्ता का अनूठा संतुलन भारतीय पेशेवरों को और भी प्रासंगिक बनाता है। विकसित देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम लागत पर उच्च-स्तरीय सेवाएं  उपलब्ध होना कंपनियों के लिए अत्यंत लाभकारी है। अंग्रेज़ी भाषा में दक्षता और बहुराष्ट्रीय अनुभव भारतीय आईटी पेशेवरों को वैश्विक टीमों के साथ सहजता से जोड़ देता है।  भारतीयों की नवाचार और नेतृत्व क्षमता ने उनकी छवि को और मजबूत किया है। गूगल के सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सत्य नडेला और एडोबी के शांतनु नारायण जैसे नेताओं ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय आईटी विशेषज्ञ केवल कुशलकर्मी ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर दूरदर्शी नेतृत्व देने में भी सक्षम हैं।

जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसकी वैश्विक पहचान न केवल औद्योगिक और तकनीकी ताकत से है,बल्कि इसके विश्वस्तरीय कंपनियों से भी है। जर्मनी में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं जो ऑटोमोबाइल,सॉफ्टवेयर,रसायन,बैंकिंग और खेल उद्योग में अग्रणी हैं। इस महीने की शुरुआत में जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडफुल भारत आएं तो उनकी यात्रा के केंद्र में भारत और जर्मनी के बीच प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग रहा। वाडेफुल के साथ भी एक काफी बड़ा कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भारत आया था  जिसमें रक्षा,चिकित्सा तकनीक और एयरोस्पेस कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल थे। अपनी यात्रा की शुरुआत में ही वाडेफुल ने फोकस स्पष्ट करते हुए भारत के साथ सुरक्षा,हथियारों में सहयोग और आर्थिक संबंधों का दायरा बढ़ाने की बात कही थी। उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत बेंगलुरु से करते हुए प्रमुख नवाचार और प्रौद्योगिकी केंद्रों का दौरा किया था। इन कार्यक्रमों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे प्रमुख भारतीय संस्थानों के साथ बैठकें शामिल थीं। वाडेफुल ने हरित प्रौद्योगिकी, डिजिटल परिवर्तन, एआई, अंतरिक्ष सहयोग और सतत शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के अवसरों पर भी प्रकाश डाला। जर्मनी यूरोप में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार  है तथा भारत में नौवां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक भी है। भारतीय शोधकर्ता मैक्स प्लैंक सोसायटी जैसे शीर्ष जर्मन संस्थानों में काम करते हैं।  जर्मनी में  साठ हजार से अधिक भारतीय अध्ययन कर रहे हैं,जो विदेशी छात्रों का सबसे बड़ा समूह भी है।

SAP एक प्रमुख बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी है। यह विश्वभर में एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर समाधान प्रदान करने में अग्रणी है। यह हजारों पेशेवरों को स्थायी और उच्च-कौशल वाले रोजगार प्रदान करता है। भारतीय आईटी विशेषज्ञों के लिए SAP एक महत्वपूर्ण  पसंद है। कंपनी में क्लाउड,एआई,डेटा एनालिटिक्स और सॉफ्टवेयर विकास जैसे क्षेत्रों में काम करने के अवसर उपलब्ध हैं। वैश्विक परियोजनाओं और बहु-सांस्कृतिक टीमों के साथ काम करने की क्षमता वाले भारतीय पेशेवर SAP के लिए आकर्षक प्रतिभा स्रोत बनते हैं। फॉक्सवैगन जर्मनी की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी है। डाइमलर एजी और बीएमडब्ल्यू ग्रुप लक्ज़री और स्पोर्ट्स कारों के क्षेत्र में विश्वविख्यात हैं। ये कंपनियां जर्मनी की ऑटोमोबाइल तकनीक और नवाचार की पहचान हैं। इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र में,सीमेंस एजी औद्योगिक ऑटोमेशन,ऊर्जा,स्वास्थ्य उपकरण और स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए जानी जाती है। वहीं, सैप एसई एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर,क्लाउड सेवाएं और डेटा एनालिटिक्स में वैश्विक नेता है। भारतीय आईटी विशेषज्ञों के लिए यह एक प्रमुख अवसर प्रदान करता है। खेल और लाइफस्टाइल उत्पादों में एडिडास एजी की वैश्विक पहचान है,जबकि कॉन्टिनेंटल एजी,ऑटोमोटिव तकनीक में प्रसिद्ध है। सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स में इंफिनियन टेक्नोलॉजीज अग्रणी कंपनी है। जर्मनी की ये प्रमुख कंपनियां तकनीकी नवाचार, उच्च गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की पहचान हैं। भारतीय आईटी विशेषज्ञों के लिए ये कंपनियां अवसरों का केंद्र हैं,जहां वे डिजिटल, सॉफ्टवेयर और तकनीकी परियोजनाओं में सक्रिय योगदान दे  रहे हैं। ट्रम्प की वीजा को लेकर भारत विरोधी नीतियों के बाद जर्मनी में भारत का प्रभाव बढ़ने की उम्मीद है। कारों से लेकर लॉजिस्टिक्स तक,जर्मन कंपनियों को भारत के विकास की संभावनाओं से बड़ी उम्मीद है। वे कुशल युवाओं की बड़ी संख्या,सस्ती लागत और करीब  सात फीसदी की आर्थिक वृद्धि दर का फायदा उठाना चाहती हैं।  पिछले कुछ वर्षों में जर्मनी और भारत के बीच व्यापार ने एक नया रिकॉर्ड बनाया है। भारत को दशक के अंत तक जर्मनी और जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की  ओर मजबूती से कदम बढ़ाएं है।

जर्मनी,सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और आईटी विशेषज्ञों की ज़बरदस्त  मांग के साथ फलता-फूलता तकनीकी उद्योग है। ब्लू कार्ड वीज़ा कार्यक्रम कुशल श्रमिकों के लिए यहां बसना आसान बनाता है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की तुलना में जर्मनी में जीवन-यापन की कम लागत तथा प्रतिस्पर्धी वेतन और उत्कृष्ट सामाजिक सुरक्षा लाभ भी है। भारत और जर्मनी के द्विपक्षीय संबंध राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक क्षेत्रों में गहराई और विविधता लिए हुए हैं। दोनों देशों ने आपसी सहयोग को मज़बूत बनाने के लिए समय-समय पर रणनीतिक समझौते और साझेदारियां स्थापित की हैं। जर्मन कंपनियां भारत में औद्योगिक उत्पादन,ऑटोमोबाइल,मशीनरी और ऊर्जा क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं। इसके साथ ही भारत उच्च-कौशल आईटी सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग समाधानों के माध्यम से जर्मनी के बाजार में योगदान देता है। जर्मनी और भारत सामरिक सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी रणनीतियों में सहयोग करते हैं। तकनीकी साझेदारी,साइबर सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के मामलों में दोनों देशों के दृष्टिकोण में सामंजस्य है। इसके अलावा,इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए दोनों देशों का सहयोग रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। भारत और जर्मनी के बीच रणनीतिक सहयोग वैश्विक मंचों पर भी देखा जा सकता है। दोनों देश संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और विश्व व्यापार संगठन जैसे बहुपक्षीय मंचों पर समान विचारधारा और लोकतांत्रिक मूल्यों को साझा करते हैं। औद्योगिक नवाचार,स्मार्ट सिटी,हरित ऊर्जा और तकनीकी नवाचार के क्षेत्रों में दीर्घकालिक साझेदारी दोनों देशों के लिए रणनीतिक महत्व रखती है। भारत जर्मनी सहयोग बहुआयामी और रणनीतिक है। आर्थिक,सामरिक और तकनीकी साझेदारी के माध्यम से यह दोनों देशों के लिए लाभकारी होने के साथ-साथ यूरोप और एशिया में स्थिरता, विकास और नवाचार का एक मजबूत आधार तैयार करती है। 

जर्मनी भारत को एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार के रूप में देख  रहा हैं,जिससे वे अपनी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर सकें और वैश्विक व्यापार में अपनी स्थिति मजबूत कर सकें।  चीन पर अपनी निर्भरता कम करने,अपने व्यापारिक हितों में विविधता लाने और अपनी आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए जर्मनी भारत के साथ संतुलन बनाना चाहता हैं। भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था और महत्वपूर्ण बाजार है। भारत की बड़ी आबादी,उच्च-कुशल कामगारों की उपलब्धता और रणनीतिक स्थान इसे चीन के अलावा एक महत्वपूर्ण आर्थिक भागीदार बनाते हैं। जर्मनी भारत को स्वास्थ्य सेवा,सूचना प्रौद्योगिकी,शिक्षा,निर्माण और सार्वजनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों में   लाखों  रिक्तियों को भरने के लिए एक प्रमुख स्रोत मानता है। जर्मनी जर्मन भाषा प्रशिक्षण को मज़बूत करने और अधिक छात्रों को आकर्षित करने के लिए भारत में अपने सहयोगी स्कूलों की संख्या करीब एक हजार करने की योजना पर काम कर रहा है। इसके साथ ही विज्ञान,प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में उच्च-गुणवत्ता वाली शिक्षा के लिए जर्मनी खुद को भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए एक आकर्षक विकल्प के रूप में स्थापित कर रहा है।

ट्रम्प के कारों पर ज्यादा  टैरिफ लगाने से जर्मनी नाराज है।  जर्मनी अपनी रक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य शक्ति पर निर्भर  रहा है। वहीं वह यूरोप का नेतृत्व भी करना चाहता है। जर्मनी की पुनः वैश्विक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षाओं  और अमेरिका पर से यूरोप की निर्भरता कम करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीक में महारत बेहद जरूरी है।  यहीं कारण है कि  जर्मनी की दीर्घकालीन नीतियों और साझेदारी में भारतीय मस्तिष्क उसकी पहली पसंद बन गया है तथा ट्रम्प की कड़ी और अदूरदर्शी वीजा नीतियों ने जर्मनी की स्थिति को और ज्यादा मजबूत कर दिया है। 

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