अमेरिका और यूरोप पर भारत को नहीं है भरोसा
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अमेरिका और यूरोप पर भारत को नहीं है भरोसा

  नवभारत टाइम्स                           

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बलपूर्वक कूटनीति एक आकर्षक रणनीति है। यह पारंपरिक सैन्य बल का उपयोग किए बिना राजनीतिक लागतों के साथ राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने की संभावना प्रदान करती है। नाटो के महासचिव मार्क रुट ने रूस के बहाने भारत और ब्राज़ील को धमकाने की जो कोशिशें की है,उसमें नाटो और अमेरिका की चीन के खिलाफ नाकामियां ज्यादा नजर आती है। नाटो के लिए चीन इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दक्षिण अमेरिकी देश ब्राज़ील और चीन का व्यापार यूरोप और अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। चीन न केवल किसी भी अन्य देश की तुलना में ब्राजील से अधिक निर्यात खरीदता है,बल्कि वह तेल से लेकर खनिज और कृषि तक प्रमुख क्षेत्रों में उत्पादन को भी नियंत्रित करता है। भारत अमेरिका की हिन्द प्रशांत रणनीति के केंद्र में है लेकिन अमेरिका की कई कोशिशों के बाद भी भारत ने चीन से संबंधों को नियंत्रित और संतुलित किया है। यहीं नहीं भारत ने चीन के खिलाफ किसी सैन्य गठ्बन्धन में शामिल होने की संभावनाओं को नकारा है ।

यह भी दिलचस्प है की यूरोप,अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कई रणनीतिक देशों में चीन की स्थिति को कमजोर करने में अमेरिका और नाटो पूरी तरीके से नाकामयाब रहे है,वहीं वे चीन के खिलाफ खड़े होने के लिए भारत जैसे शांत देश पर दबाव डाल रहे है । नाटो और अमेरिका हिन्द प्रशांत में भारत की मदद के बिना चीन को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है और यहीं मजबूरी अब दबाव के रूप में सामने आ रही है।

हिंद प्रशांत,अफ्रीका के तटों से अमेरिका तक फैला हुआ विशाल भौगोलिक समुदी परिक्षेत्र है,जिसमें अरब सागर,खाड़ी क्षेत्र,हिंद महासागर,दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर शामिल हैं। यह दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले और आर्थिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों में से एक है,जिसमें एशिया,अफ्रीका,ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका  महाद्वीप शामिल हैं। हिन्द प्रशांत  समुद्री व्यापार और रसद मार्गों का केंद्र है तथा भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आपस में गहरे स्तर पर संबद्ध हुई हैं। जो दुनिया के सबसे बड़े बाजारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह एक बहु-ध्रुवीय क्षेत्र है जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और जनसंख्या के आधे से अधिक के लिए जिम्मेदार है। खनिज,तेल और गैस के भंडार होने के साथ ही यहां मछली भी बहुतायत पाई जाती है। हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है और वह मध्य पूर्व,मध्य एशिया,चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच स्थित है। हिन्द प्रशांत द्वीप समूह पर चीन की लंबे समय से निगाहें हैं। करीब डेढ़ दशक से चीन इस इलाक़े में अपने व्यापार,आर्थिक मदद,कूटनीतिक और व्यावसायिक गतिविधियों को लगातार बढ़ा रहा है। हिन्द प्रशांत द्वीप समूहों के संसाधनों पर चीन की नजर है,ये संसाधन चीन के विकास के लिए अहम हैं। इसलिए इन संसाधनों तक बेहतर पहुंच बनाना भी चीन की प्राथमिकता है। वहीं सामरिक दृष्टि से भी यह माना जाता है कि हिन्द प्रशांत क्षेत्र में मजबूती,युद्धकाल में महत्वपूर्ण बढ़त दे सकती है तथा तौल मोल की कूटनीति को भी पुख्ता करती है।

एशिया में प्रभाव कायम करने और चीन को दबाने के लिए अमेरिका का सख़्त रुख बार बार सामने आता है,लेकिन वह कामयाब नहीं हो पा रहा है। भारत,इंडोनेशिया,ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओस और वियतनाम जैसे देश चीन की विस्तारवादी नीतियों से चिंतित रहे है। लेकिन इन देशों को अमेरिका पर भी भरोसा नहीं है। अमेरिका ने क्वाड जैसा समूह बनाकर भारत को उसका सदस्य बनाया, जबकि हकीकत में क्वाड के सदस्य देशों  जापान,ऑस्ट्रेलिया और भारत के चीन से आर्थिक सम्बन्ध मजबूत रहे है।         

 2021 में नाटो की रणनीतिक रिपोर्ट में पहली बार चीन को सुरक्षा चुनौती के रूप में नामित किया गया था इसके बाद  2022  के मैड्रिड शिखर सम्मेलन में नाटो ने औपचारिक रूप से कहा था कि चीन की नीतियां  नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देती हैं।  नाटो की 2022 की रणनीतिक अवधारणा इस गठबंधन को चीनी सैन्य, आर्थिक और औद्योगिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए ट्रान्साटलांटिक प्रयासों के एक अभिन्न अंग के रूप में परिभाषित करती है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन की पहली क्षेत्रीय विशिष्ट रिपोर्ट हिंद-प्रशांत रणनीति पर फरवरी 2022 में जारी की गई थी,जिसमें यह स्पष्ट किया गया था की भारत अहम भूराजनीतिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। ये चुनौती ख़ासतौर पर चीन और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर उसके रुख़ से मिल रही है।  रिपोर्ट में चीन को लेकर कहा गया  था कि वह आर्थिक, कूटनीतिक, सैन्य और तकनीकी ताक़त के बल पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर प्रभाव डाल रहा है। 

 

अमेरिका और नाटो की चीन को चुनौती देने की कोशिशों के बीच भारत से यह अपेक्षा बढ़ गई की भारत चीन के खिलाफ आक्रामक व्यवहार करें। अमेरिका ने भारत को सैन्य मदद देने की पेशकश कर चीन पर दबाव बढ़ाने की कोशिशें भी की। लेकिन भारत ने बेहद संयमित होकर रणनीतिक  फैसले लिए और चीन के खिलाफ किसी विदेशी मदद से परहेज किया। भारत को अमेरिका पर भरोसा नहीं है,वहीं यूरोप के दोहरे मापदन्डों को लेकर भी भारत सतर्क रहा है । चीन ने 2012 में मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ सहयोग बढ़ाने के इरादे से  एक फ़ोरम शुरू किया था। इसमें अल्बानिया,बोस्निया एवं हर्जेगोविना, बुल्गारिया,क्रोएशिया,चेक गणराज्य,एस्टोनिया,ग्रीस,हंगरी, लातविया,स्लोवाकिया,मॉन्टेनिग्रो,सर्बिया,पोलैंड नॉर्थ मेसिडोनिया,रोमानिया और स्लोवेनिया शामिल हैं। दक्षिणपूर्वी,मध्य और पूर्वी यूरोप में चीन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। यह देखा गया है कि यूरोप और नाटो  के एक अहम सदस्य फ़्रांस की नीतियां अमेरिका और चीन को समान और संतुलित रही है।  यूरोपीय संघ एक मजबूत संगठन है जो व्यापार,सुरक्षा,कृषि मत्स्य पालन,पर्यावरण और जलवायु सहित विभिन्न क्षेत्रों में काम करता है। वैश्विक कूटनीति में इसका अहम स्थान है। यूरोपीय संघ स्थिरता,सुरक्षा ,समृद्धि,लोकतंत्र,आधारभूत स्वतंत्रता एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विधि के नियमों को बढ़ावा देने के लिये कार्य करता है। अमेरिका के  साथ इसके गहरे आर्थिक और सामरिक सरोकार है और नाटो इसका संवर्धन करता है। इंडो पैसिफिक में चीन सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन नाटो के कई देश मानते है कि यूरोप को अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम कर देनी चाहिए। चीन को लेकर यूरोपीय देशों और अमेरिका में मतभेद खुलकर सामने आते रहे है। 

भारत  की अपनी रणनीतिक जरूरतें है और इस कारण भारत सैन्य गठबन्धनों से दूर रहा है। अब नाटो प्रमुख भारत पर दबाव बनाने की कोशिशें कर रहे है लेकिन अमेरिका और नाटो यह भलीभांति जानते है की यदि उन्हें चीन की चुनौती का मुकाबला करना है तो भारत से बेहतर उनका कोई और सहयोगी देश नहीं हो सकता। जाहिर है भारत को नाटो की जरूरत नहीं है लेकिन अमेरिका और नाटो को भारत की हमेशा जरूरत पड़ती रहेगी। यहीं कारण है की भारत ने नाटो,यूरोप और अमेरिका को कड़ा संदेश देते हुए कहा है की भारत जनता की ऊर्जा जरूरतों के आगे किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय दबाव या दोहरे मापदंड को नहीं स्वीकारेगा और वह वैश्विक हालात और बाजारों के मुताबिक ही अपने फैसले लेता रहेगा ।

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