अमेरिका के पास भारत का कोई विकल्प नहीं
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अमेरिका के पास भारत का कोई विकल्प नहीं

 पीपुल्स समाचार

 कोई भी देश वैश्विक ताक़त बड़ी और मज़बूत अर्थव्यवस्था के आधार पर बनता है। ट्रम्प इस बात को बखूबी जानते है,इसीलिए उन्होंने भारत की सामरिक स्वायत्ता को खत्म करने के लिए टैरिफ का दांव खेल दिया है। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 2030 तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावनाओं वाले भारत को सुप्त अर्थव्यवस्था बताना और फिर अविश्वसनीय तरीके से टैरिफ का बढ़ाना ट्रम्प की कूटनीतिक गलती है जिसके दूरगामी परिणाम चीन की मजबूती के रूप में सामने आयेंगे और यह अमेरिका के दीर्घकालीन हितों के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अमेरिका की हिन्द प्रशांत की नीति के केंद्र में भारत है और समन्दर में बड़ा रणनीतिक सहयोगी भी है। चीन का आर्थिक और सैन्य उदय अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व के लिए एक सीधी चुनौती बन चुका है। चीन की आक्रामक विदेश नीति और बेल्ट एंड रोड पहल ने अमेरिका की रणनीतिक पकड़ को कमजोर किया है।

वहीं ट्रम्प के तेवर से सामरिक स्वायत्ता की सुरक्षा को लेकर भारत की वैदेशिक नीति के सामने नई चुनौती आ गई है। सामरिक स्वायत्तता को किसी राज्य की अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने और अन्य विदेशी राज्यों पर बहुत अधिक निर्भर हुए बिना अपनी पसंदीदा विदेश नीति अपनाने की क्षमता के रूप में पहचाना जाता है। भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति ने शीतयुद्द के जटिल वातावरण में भी राष्ट्रीय हितों का संवर्धन बेहद शानदार तरीके से किया था। पीएम मोदी ने गुटनिरपेक्षता  से आगे बढ़कर सभी को दोस्त बनाने की यथार्थवादी नीति को अपनाने की और कदम बढ़ाएं,इसमें उन्हें सफलता भी मिली। पीएम मोदी की कैमरे के सामने पुतिन को दी गई नसीहत कि,यह दौर डेमोक्रेसी,डिप्लोमेसी और डायलॉग का है,न कि युद्ध का,इसे पश्चिम और अमेरिका को खूब सराहा था। लेकिन इन सब घटनाक्रम के बीच भारत के लिए यह विचारणीय है की क्या भारत को सबका मित्र बने रहने के बारे में सोचना चाहिए और इससे क्या राष्ट्रीय हितों की संवृद्धि हो सकती है। यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर पश्चिम के देश भारत के रुख से  कभी ख़ुश नहीं थे। भारत संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन को लेकर रूस के ख़िलाफ़ सभी बड़े प्रस्ताव पर वोटिंग से बाहर रहा था। अमेरिका और यूरोप के बड़े देश चाहते थे कि भारत रूस के ख़िलाफ़ वोट करे। वहीं पुतिन ने यूक्रेन पर हमले की घोषणा की तब से भारत का रूस से तेल आयात बढ़ता गया। जबकि पश्चिम के देश रूस पर प्रतिबंध कड़े कर रहे थे जिससे उसकी आर्थिक गतिविधियों को रोका जा सके। ट्रम्प इस स्थिति को बदलना चाहते है और यूक्रेन को लेकर रूस को दबाव में लाना चाहते है।  वे रूस के प्रमुख सहयोगियों पर प्रतिबंधों से उन्हें डराना चाहते है।

भारत के  सत्तर फीसदी से अधिक रक्षा उपकरण रूसी तकनीक या प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं। इन हथियारों और मशीनों की मेंटनेंस,सर्विसिंग के साथ उनके स्पेयर पार्ट्स को अपग्रेड करने के मामले में भारत पूरी तरह से रूस पर निर्भर है। रूस का भारत के पास कोई विकल्प नहीं है। रूस का भारत को उन्नत हथियार उपलब्ध कराना भारत की पाकिस्तान और चीन के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। ट्रम्प की प्राथमिकता आर्थिक सौदों, व्यापार घाटे की भरपाई और अमेरिकी उत्पादों को बेचने पर केंद्रित है तथा उन्होंने पारंपरिक सुरक्षा साझेदारी की प्राथमिकताओं को पीछे धकेल दिया है। अब भारत के लिए यह एक चुनौती है कि वह सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए,अमेरिका से अपने संबंधों को बहुआयामी बनाकर संतुलन साधने की नीति पर काम करें।

भारत की रणनीतिक स्थिति उसे विश्व शक्तियों के साथ संतुलन बनाने,क्षेत्रीय नेतृत्व स्थापित करने और वैश्विक एजेंडे को प्रभावित करने का अवसर देती है। वहीं भारत की भौगोलिक स्थिति उसे चीन,मध्य एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ जुड़ाव का लाभ देती है। चीन  हिन्द प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक नीति अपना रहा है। भारत इस क्षेत्र में एक मजबूत लोकतांत्रिक ताकत है जो अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर क्वाड जैसे गठबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिका और यूरोप को इस क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की भू-राजनीतिक स्थिति और नौसेना शक्ति की जरूरत है। चीन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का बड़ा केंद्र है,लेकिन उस पर निर्भरता अब एक रणनीतिक खतरा बनती जा रही है। अमेरिका और यूरोप चाहते हैं कि उत्पादन और सप्लाई चेन का एक बड़ा हिस्सा भारत जैसे लोकतांत्रिक,स्थिर और श्रमशक्ति से भरपूर देशों में शिफ्ट हो। चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत है,लेकिन भारत की आबादी अब चीन से ज़्यादा हो चुकी है और तेजी से बढ़ती मध्यम वर्ग इसे एक बड़ा उपभोक्ता बाजार बनाता है। अमेरिका भारत के महत्व को नकार नहीं सकता ।

चीन बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिए एशिया,अफ्रीका और यूरोप में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। अमेरिका और यूरोप भारत को काउंटर वेट के रूप में देखते हैं जो इस प्रभाव को दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलित कर सकता है। भारत अकेला ऐसा देश है जो जनसंख्या,भू-राजनीतिक स्थिति,सैन्य शक्ति,मानवाधिकार,समावेशी विचारधारा,लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक संभावना में चीन का एक स्थायी और वैकल्पिक जवाब बन सकता है। इसलिए अमेरिका और यूरोप को चीन से मुकाबला करने के लिए भारत की न केवल जरूरत है,बल्कि वे भारत को एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं। अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से भारत को पश्चिमी देशों में सम्मान मिलता है। वहीं चीन से निपटने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत सदा पड़ती रहेगी।

भारत लोकतंत्र,मानवाधिकार,शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व,गुटनिरपेक्षता,सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक शांति जैसे मूल्यों को प्राथमिकताओं पर चलने वाला देश रहा है तथा जलवायु परिवर्तन,सतत विकास,वैश्विक स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सक्रिय भागीदारी जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी भारत की भूमिका बेहद निर्णायक  रही है। इस प्रकार एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में भारत न केवल अपनी सामरिक स्वायत्तता को सुरक्षित  रख सकने में कामयाब रहा है बल्कि वैश्विक मंच पर एक नैतिक और संतुलित नेतृत्व की भूमिका भी निभाता रहा है। अमेरिकी नीति निर्माता इस तथ्य से भलीभांति परिचित है की कोई भी राष्ट्र अकेले एक सुरक्षित और बेहतर विश्व का निर्माण नहीं कर सकता। लोकतांत्रिक और जिम्मेदार गठबंधन और बहुपक्षीय  संस्थाएं मूल्यों पर आधारित राष्ट्रों की शक्ति को कई गुना बढ़ा सकती हैं। अमेरिकी प्रशासन भारत में इक्कीसवीं सदी की महान लोकतांत्रिक शक्तियों में से एक बनने की क्षमता देखता रहा है और इसी के अनुरूप कूटनीतिक कोशिशों से पिछले  ढाई दशक में दोनों देशों के संबंधों में मजबूती आई है। ट्रम्प इसे बाधित कर  रहे है,इससे उन्हें तात्कालिक आर्थिक फायदा भले ही नजर आएं लेकिन भारत को नजरअंदाज कर पाकिस्तान को महत्व देना अमेरिका की हिन्द प्रशांत नीति,क्वाड  सहयोग और वैश्विक लोकतांत्रिक गठजोड़ को कमजोर  कर देगा। रूस और चीन,भारत के समर्थन का इंतजार कर रहे है और ट्रम्प की नीतियां भारत को इस गठबन्धन का हिस्सा बनने का अवसर दे रही है।

ट्रम्प यदि भारत के साथ अपने संबंधों में संतुलन नहीं  रखते,पाकिस्तान जैसे अस्थिर देशों को तरजीह  देते है  और भारत की  सुरक्षा संबंधी चिंताओं की अनदेखी करते है तो वह एक बड़ी भूराजनैतिक भूल कर  रहे है। भारत,रूस और चीन तीनों एशियाई ताकतें हैं,जिनके आपसी मतभेद के बावजूद अमेरिका की एकतरफा और असंतुलित नीतियां उन्हें साझा मंच पर लाने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। ट्रम्प की नीतियों से नया एशियाई शक्ति-संतुलन कायम हो सकता है तथा यह अमेरिकी डॉलर की बादशाहत के लिए भी संकट बढ़ा सकता है। उम्मीद है ट्रम्प अमेरिका के दीर्घकालीन हितों को नुकसान पहुंचने वाली योजनाओं को लागू करने से जल्द ही पीछे हट जायेंगे।

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