अशांत पाकिस्तान में भारत के लिए अवसर 
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अशांत पाकिस्तान में भारत के लिए अवसर 

   जनसत्ता

पाकिस्तान की राजनीति में सैन्य वर्चस्व ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया है, आर्थिक सुधारों को बाधित किया है तथा कट्टरपंथी संगठनों के प्रति दोहरी नीति को जन्म दिया है। इसके कारण पाकिस्तान आज राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह स्थिति भारत के लिए अनेक रणनीतिक अवसर प्रस्तुत करती है। पीओके में पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन की आवाजों के बीच भारत का समर्थन देखा जा रहा है। पाकिस्तान दुनिया भर में कश्मीर के मुद्दें को भारत को बदनाम करने लिए हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है लेकिन अब लंदन में पाकिस्तानी दूतावास के सामने कश्मीरियों के प्रदर्शन से भारत  का दावा मजबूत हुआ है। बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान को भारत से सीखने की नसीहत दे रहे है वहीं  खैबर पख्तूनख्वा में पश्तून पाकिस्तान से ज्यादा भारत के करीब नजर आते है।

पाकिस्तान औपचारिक रूप से पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे चार संवैधानिक प्रांतों का संघीय गणराज्य है। गिलगित-बाल्टिस्तान तथा   पीओके अलग प्रशासनिक इकाइयां है। पिछले एक दशक में खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान तथा पीओके में राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी प्रश्नों को लेकर असंतोष लगातार बढ़ा है। इन सभी क्षेत्रों में इस्लामाबाद और सैन्य प्रतिष्ठान के प्रति लोगों में गहरा असंतोष है और अब अलग होने की मांग जोर पकड़ चूकी है।पीओके तथा गिलगित-बाल्टिस्तान में उभरते राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक असंतोष भारत के लिए प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का नहीं, बल्कि कूटनीतिक, रणनीतिक और वैचारिक स्तर पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करते है। भारत लंबे समय से इन क्षेत्रों को अपने अभिन्न अंग के रूप में मानता है। यहां की परिस्थितियों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तथ्यों और मानवाधिकार संबंधी चिंताओं के आधार पर प्रभावी ढंग से उठाने के वैदेशिक मंत्रालय को ज्यादा प्रयास करना चाहिए।

भारत की लोकतांत्रिक साख से पाकिस्तान पर स्वाभाविक बढ़त हासिल है और यही भारत की असल ताकत भी है। लोकतांत्रिक संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका, नियमित चुनाव, स्थानीय स्वशासन और संवैधानिक अधिकार किसी भी क्षेत्र की स्थिरता और विकास के लिए अनिवार्य हैं। भारत का लोकतांत्रिक शासन मॉडल और विकास-आधारित दृष्टिकोण दुनिया के सामने है। पाकिस्तान में नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है, भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के सार्वभौमिक सिद्धांतों के संदर्भ में इसे पुरजोर तरीके से उठाना होगा। भारत विकास, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और लोकतांत्रिक भागीदारी के क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर में हुए परिवर्तनों को वैश्विक समुदाय के समक्ष अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर दोनों ओर की प्रशासनिक व्यवस्थाओं की तुलना का एक वैकल्पिक विमर्श दुनिया के सामने ला सकता है। पाकिस्तान का कश्मीर को लेकर भ्रम फ़ैलाने की नीति की हकीकत को दुनिया के सामने लाने के बड़े  अवसर के रूप में इसे देखा जाना चाहिए। गिलगित-बाल्टिस्तान का बड़ा सामरिक महत्व है। यह क्षेत्र चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का प्रमुख प्रवेश मार्ग है। यह परियोजना उस क्षेत्र से होकर गुजरती है, जो भारत की जमीन है और चीन का वहां अवैध कब्जा है। भारत अपने प्रमुख साझेदार देशों के साथ आतंकवाद, सीमा-पार उग्रवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाकर अपनी रणनीतिक स्थिति को और सुदृढ़ कर सकता है। भारत की नीति का आधार संयम, कूटनीतिक सक्रियता, राष्ट्रीय सुरक्षा की तैयारी और क्षेत्रीय स्थिरता होना चाहिए। पीओके में विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं  और आकांक्षाएं मौजूद हैं। इसलिए भारत के लिए सबसे प्रभावी रणनीति यह होगी कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों, विकास, सुशासन और संवैधानिक व्यवस्था की अपनी उपलब्धियों को सशक्त रूप से प्रस्तुत करे तथा कूटनीतिक स्तर पर अपने दावों और हितों को तथ्य एवं अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप आगे बढ़ाएं।

बलूचिस्तान में जारी असंतोष, मानवाधिकार संबंधी चिंताएं तथा राजनीतिक अस्थिरता भारत के लिए अपनी कूटनीतिक सक्रियता और वैश्विक विश्वसनीयता को मजबूत करने का अवसर प्रदान कर रही है। भारत लंबे समय से आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करता रहा है। ऐसे में बलूचिस्तान की परिस्थितियों के संदर्भ में भारत नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, मानवाधिकारों तथा समावेशी शासन की आवश्यकता पर अधिक प्रभावी ढंग से अपनी बात रख सकता है। किसी भी बहु-जातीय और बहुभाषी समाज में दीर्घकालिक स्थिरता केवल सैन्य उपायों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों, न्यायपूर्ण प्रशासन और समावेशी विकास से सुनिश्चित होती है। पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही से लोगों का उत्पीड़न हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं और संयुक्त राष्ट्र में बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चिंता सामने आई है। भारत इन विषयों पर सिद्धांत आधारित और तथ्यपरक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपनी कूटनीतिक स्थिति स्पष्ट कर सकता है। इससे भारत की यह छवि मजबूत होगी कि वह मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्व देता है। भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग  पर हमेशा बल दिया है। बलूचिस्तान की अस्थिरता यह दर्शाती है कि केवल सैन्य दृष्टिकोण से जटिल राजनीतिक समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं होता। भारत इस अनुभव के आधार पर आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कट्टरपंथ के विरुद्ध साझा रणनीति और क्षेत्रीय स्थिरता की आवश्यकता पर बल दे सकता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सुरक्षा संबंधी चुनौतियां  यह संकेत देती है कि बड़े अवसंरचनात्मक निवेश तभी सफल हो सकते हैं जब स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारदर्शिता और राजनीतिक स्वीकार्यता सुनिश्चित हो। भारत अपने संपर्क और विकास संबंधी परियोजनाओं में स्थानीय भागीदारी, पारदर्शी शासन और साझेदारी-आधारित मॉडल को प्रमुखता देकर स्वयं को एक विश्वसनीय विकास साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। भारत यदि लोकतांत्रिक शासन, विकास, क्षमता निर्माण, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव-केंद्रित विकास मॉडल को आगे बढ़ाता है, तो उसकी सॉफ्ट पावर और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव दोनों में वृद्धि हो सकती है। पाकिस्तान में दीर्घकालिक अस्थिरता का प्रभाव सीमा-पार सुरक्षा, आतंकवाद, शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग पर भी पड़ सकता है। इसलिए भारत के हित में यही होगा कि वह मजबूत सीमा सुरक्षा, प्रभावी कूटनीति, वैश्विक साझेदारियों और लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन के माध्यम से अपनी स्थिति को सुदृढ़ करे।

खैबर पख्तूनख्वा की जटिल परिस्थितियां, अफगानिस्तान के साथ इसके ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध तथा पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां भारत के लिए प्रत्यक्ष हस्तक्षेप  के साथ कूटनीतिक, रणनीतिक और क्षेत्रीय सहयोग के नए अवसर प्रस्तुत कर रही है। भारत की नीति परंपरागत रूप से क्षेत्रीय स्थिरता, आतंकवाद के विरोध और विकास आधारित सहयोग पर आधारित रही है। इसलिए इन परिस्थितियों में भारत अपनी दीर्घकालिक रणनीति को और प्रभावी बना सकता है। भारत और अफगानिस्तान के बीच ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ सांस्कृतिक, आर्थिक और जनसंपर्क संबंध रहे हैं। पिछले  ढाई दशकों में भारत ने अफगानिस्तान में संसद भवन, सलमा बांध, सड़क निर्माण, विद्युत परियोजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा क्षमता निर्माण जैसे अनेक विकास कार्यों में योगदान दिया। इन परियोजनाओं ने भारत की एक विश्वसनीय विकास साझेदार की छवि बनाई है। अगस्त 2021 के बाद अफगानिस्तान की राजनीतिक परिस्थितियां  बदली, फिर भी भारत ने मानवीय सहायता, चिकित्सा सहयोग और सीमित राजनयिक संपर्क बनाए रखा है। इससे भारत को अफगान जनता के बीच अपनी सकारात्मक छवि बनाए रखने में सहायता मिली है। खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ती अस्थिरता भारत को यह अवसर भी देती है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद, सीमा-पार उग्रवाद और कट्टरपंथ के विरुद्ध अपनी चिंताओं को अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करे। यदि पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा दबाव बढ़ता है, तो वह भारत की सीमा पर अपने हस्तक्षेप को रोकने के लिए मजबूर होगा। इससे भारत को अपनी सामरिक और विदेश नीति में आर्थिक विकास, क्षेत्रीय संपर्क और वैश्विक साझेदारियों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलता है।

भारत के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण अवसर मध्य एशिया और अफगानिस्तान के साथ दीर्घकालिक संपर्क रणनीति को मजबूत करने का है। ईरान के चाबहार बंदरगाह तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे जैसी परियोजनाएं  भारत को पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच का वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराती हैं। इससे भारत की भू-आर्थिक और सामरिक स्थिति दोनों मजबूत होती हैं। भारत यह संदेश दे सकता है कि विविधता वाले समाजों में स्थायी शांति केवल सैन्य उपायों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों, आर्थिक विकास और स्थानीय समुदायों के विश्वास से सुनिश्चित होती है। यह दृष्टिकोण भारत की वैश्विक छवि को एक जिम्मेदार और स्थिर लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में सुदृढ़ करता है। इन सबके बीच भारत के लिए कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां भी आवश्यक हैं। खैबर पख्तूनख्वा में अस्थिरता से आतंकवादी नेटवर्कों की गतिविधियां बढ़ सकती है, जिनका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसलिए भारत को सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, खुफिया समन्वय तथा क्षेत्रीय कूटनीति को निरंतर मजबूत बनाएं  रखना होगा।

दीर्घकालिक दृष्टि से भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक बढ़त किसी पड़ोसी देश की आंतरिक कमजोरियों पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि अपनी राष्ट्रीय शक्ति के सभी आयामों को निरंतर सुदृढ़ करने में निहित है। मजबूत अर्थव्यवस्था, तीव्र अवसंरचनात्मक विकास, तकनीकी नवाचार, रक्षा आधुनिकीकरण, कुशल कूटनीति और विश्वसनीय लोकतांत्रिक संस्थाएं  भारत की वास्तविक रणनीतिक पूंजी है। भारत , जम्मू-कश्मीर सहित अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास, सुशासन, निवेश, पर्यटन, शिक्षा और नागरिक भागीदारी का सफल मॉडल प्रस्तुत कर सॉफ्ट पावर की छवि को लगातार मजबूत कर रहा है,इससे पाकिस्तान के कई सूबे भारत की तरफ आकर्षित हो रहे है। वहीं आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट नीति, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता तथा मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन से भारत वैश्विक मंचों पर नैतिक और राजनीतिक विश्वसनीयता को और मजबूती दे सकता है।

पाकिस्तान में सैन्य वर्चस्व से उभरे आंतरिक असंतोष और भारत में मजबूत लोकतंत्र तथा राजनीतिक स्थिरता के बहुआयामी कूटनीतिक और रणनीतिक संदेश है। इस अवसर का उपयोग क्षेत्रीय संपर्क,  तीसरी दुनिया के नेतृत्व, हिंद-प्रशांत सहयोग, प्रौद्योगिकी, व्यापार और रणनीतिक साझेदारियों को विस्तार देने में करना चाहिए। भारत अपनी आर्थिक क्षमता, सैन्य प्रतिरोधक शक्ति, कूटनीतिक प्रभाव और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को समान गति से आगे बढ़ाएगा, तब वह केवल दक्षिण एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी अधिक प्रभावशाली और निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में होगा। यही भारत की स्थायी रणनीतिक बढ़त और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सबसे मजबूत आधार बनेगा।

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