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इसरो भारत की वह प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसी है जिसने सीमित संसाधनों में अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल करके भारत को अंतरिक्ष क्षेत्र की अग्रणी शक्तियों में स्थान दिलाया है। इसरो का भारत के वैज्ञानिक, तकनीकी और सामरिक विकास में अभूतपूर्व योगदान रहा है। दुनिया में भारत को पहचान दिलाने वाला इसरो इस समय बड़े संकट में है। दरअसल अब अनेक वैज्ञानिक और इंजीनियर्स निजी अंतरिक्ष कंपनियों और स्पेस स्टार्टअप्स के कारण इसरो को छोड़ कर जा रहे है। इसरो में काम करने वाले कई वैज्ञानिक गरीब और साधारण पृष्ठभूमि के रहे है लेकिन अब युवाओं के लिए निजी क्षेत्र में बेहतर और सुनहरे अवसर बढ़े है। इसरो की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसके अनेक वैज्ञानिक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से निकलकर अपनी प्रतिभा, परिश्रम और राष्ट्रसेवा के बल पर इतिहास रचते रहे है। अंतरिक्ष में भारत का भविष्य आगे क्या होगा, कहीं भारतीय वैज्ञानिक दुनिया की अन्य निजी कम्पनियों की और नहीं चले जाये। वैसे भी अनेक भारतीय वैज्ञानिक पहले ही दूसरे देशों में जाकर बस गए है और वहां जाकर काम कर रहे है। ऐसे में भारत की नई स्पेस पॉलिसी इसरो और देश के लिए चुनौती है या युवाओं के लिए अवसर है,इसका विश्लेषण करना बेहद जरूरी है।
भारत के मिसाइल कार्यक्रम और अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में डॉ.अब्दुल कलाम का योगदान अतुलनीय है। वे सन 1969 से 1982 तक इसरो से जुड़े रहे और भारत को अंतरिक्ष क्लब में शामिल कराने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। मिसाइल मैन कलाम के पिता एक नाविक थे जो मछुआरों को नाव किराए पर देते थे। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कलाम साहब को स्कूल की पढ़ाई जारी रखने और परिवार की मदद के लिए बचपन में अखबार बेचने का काम करना पड़ा था। पूर्व इसरो प्रमुख डॉ.के.सिवन को रॉकेट मैन कहा जाता है। उनके पिता आम के बागानों में काम करते थे। सिवन ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई नंगे पैर और धोती पहनकर पूरी की थी क्योंकि उनके पास जूते खरीदने के पैसे नहीं थे। डॉ.सिवन का इसरो में 1982 से 2022 तक का चार दशकों का सफर बेमिसाल रहा है। स्वदेशी रॉकेट तकनीक के विकास से लेकर इसरो के शीर्ष नेतृत्व तक, उनका योगदान भारत को अंतरिक्ष महाशक्ति बनाने में मील का पत्थर साबित हुआ है।
दूसरी और बेहतर विकल्पों की तलाश में देश से बाहर जाने वाले वैज्ञानिकों की संख्या भी कम नहीं है। कल्पना चावला,अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय मूल की महिला थी। उन्होंने नासा के कोलंबिया अंतरिक्ष शटल मिशन पर एक एयरोस्पेस इंजीनियर और मिशन विशेषज्ञ के रूप में काम किया। अंतरिक्ष विज्ञान में उनका योगदान दुनिया भर की महिलाओं के लिए प्रेरणा है। नासा की सबसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष में सबसे लंबे समय तक स्पेस वॉक करने का रिकॉर्ड बनाया। वे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की कमांडर भी रही। अमेरिकी वायु सेना के कर्नल और नासा के अंतरिक्ष यात्री राजाचारी नासा के क्रू- तीन, मिशन के कमांडर के रूप में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन गए थे। वे नासा के आगामी आर्टेमिस मिशन का भी हिस्सा है, जो इंसानों को दोबारा चांद पर भेजेगा। भारतीय-अमेरिकी मूल के डॉ.अनिल मेनन एयरोस्पेस मेडिकल विशेषज्ञ और अमेरिकी स्पेस फोर्स के कर्नल है,वे पहले स्पेस एक्स के मुख्य फ्लाइट सर्जन भी रह चुके है। आंध्र प्रदेश में जन्मी एयरोनॉटिकल इंजीनियर सिरीशा बांदला ने 2021 में वर्जिन गैलेक्टिक के कमर्शियल स्पेस शिप से अंतरिक्ष की यात्रा की थी। नासा के मिशनों को लीड करने वाले वैज्ञानिक डॉ.स्वाति मोहन का मार्स 2020 मिशन में प्रमुख योगदान था।
अमेरिका ने नासा से आगे बढ़कर एलन मस्क पर भरोसा दिखाया है, अब एलन मस्क की कम्पनी स्पेस एक्स सेटेलाईट लांचिंग से लेकर अमेरिका के कई सामरिक अभियानों का हिस्सा है। यह भी दिलचस्प है कि स्पेस एक्स में काम करने वाले अधिकांश वैज्ञानिक भारतीय ही है। स्पेस एक्स ने अमेरिका को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, वाणिज्यिक प्रक्षेपण और वैश्विक उपग्रह सेवाओं में अग्रणी बनाया है। अब भारत को भी लगता है कि यदि तकनीकी नवाचार, निजी निवेश, रॉकेट तकनीक और प्रभावी नीतिगत सुधारों पर सुधार किया जाता है तो वह वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत कर सकता है। भारत की नई स्पेस नीति और इस क्षेत्र में निजीकरण अमेरिका की नीति पर ही आधारित माना जा रहा है। पिछले एक साल में अनुमानित सौ से एक सौ बीस वैज्ञानिक इसरो छोड़कर स्पेस स्टार्टअप्स से जुड़ गए है। इससे इसरो पर दबाव बढ़ा है और इस्तीफ़ा स्वीकार करने के नियमों में भारत की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसी को बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। वैश्विक स्पेस इंडस्ट्री में भारतीय वैज्ञानिकों की मांग उनकी गणितीय सटीकता, कठिन परिस्थितियों में काम करने की क्षमता और तकनीकी सूझबूझ के कारण हमेशा सर्वोच्च रहती है।
भारत में इस समय एक सौ पचास से भी ज्यादा स्पेस टेक स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं। स्कॉयरूट एयर स्पेस ने नवंबर 2022 में विक्रम-एस नामक रॉकेट लॉन्च किया था जो भारत का पहला निजी तौर पर विकसित रॉकेट था। इसके फाउंडर पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका नामक इसरो के पूर्व वैज्ञानिक हैं। यह कंपनी छोटे उपग्रहों को बहुत ही कम लागत और कम समय में अंतरिक्ष में भेजने के लिए विक्रम सीरीज के रॉकेट बना रही है। अग्निकुल कॉसमॉस ने दुनिया का पहला 3D-प्रिंटेड सिंगल-पीस रॉकेट इंजन अग्निबाण विकसित किया है। इस इंजन को पूरी तरह से 3D प्रिंटर द्वारा एक बार में बनाया जाता है,जिससे रॉकेट निर्माण की लागत और समय बेहद कम हो जाता है। इन्होंने इसरो के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के अंदर अपना खुद का निजी लॉन्चपैड भी स्थापित किया है। पिक्सेल कंपनी पृथ्वी के अवलोकन के लिए हाइपरस्पेक्ट्रल उपग्रहों का एक समूह तैयार कर रही है। इनके उपग्रहों से मिलने वाली तस्वीरें इतनी साफ और विस्तृत होती हैं कि उनसे खेती में बीमारियों का पता लगाने, तेल रिसाव ढूंढने और पर्यावरण प्रदूषण की सटीक मैपिंग करने में मदद मिलती है। इन्हें अमेरिकी खुफिया एजेंसी और नासा से भी प्रोजेक्ट्स मिले हैं। दिगंतरा,स्टार्टअप अंतरिक्ष में जमा हो रहे कचरे और ट्रैफिक पर नजर रखने के लिए काम कर रहा है। अंतरिक्ष में हजारों निष्क्रिय उपग्रह और मलबे तैर रहे हैं जो नए रॉकेट्स के लिए खतरा हैं। दिगंतरा दुनिया का पहला स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस नेटवर्क बना रहा है जो उपग्रहों को आपस में टकराने से बचाएगा।
आज इन स्टार्टअप्स में देश-विदेश के बड़े निवेशक करोड़ों डॉलर का निवेश कर रहे है। भारत की निजी स्पेस इंडस्ट्री आने वाले समय में दुनिया के मल्टी-बिलियन डॉलर स्पेस मार्केट पर कब्जा करने की ओर अग्रसर है। वैज्ञानिकों का इसरो छोड़कर निजी स्पेस स्टार्टअप्स की तरफ रुख करना पहली नजर में देश के लिए एक बड़ा नुकसान लग सकता है, क्योंकि देश के शीर्ष संस्थान से प्रतिभा का पलायन हो रहा है। लेकिन, अंतरिक्ष विज्ञान और आज के आर्थिक परिदृश्य के नजरिए से देखें तो यह देश के लिए एक बहुत बड़ा वरदान और फायदेमंद बदलाव है। पहले भारत के शीर्ष वैज्ञानिक देश छोड़कर नासा या विदेशी कंपनियों में चले जाते थे, जिससे भारत को सीधे तौर पर नुकसान होता था। लेकिन अब वैज्ञानिक देश के भीतर ही भारतीय स्टार्टअप्स से जुड़ रहे है। इससे प्रतिभा और बौद्धिक संपदा भारत के भीतर ही सुरक्षित और विकसित हो रही है। अमेरिका में नासा खुद सारे रॉकेट नहीं बनाता,वह स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियों की सेवाएं लेता है। भारत सरकार भी अब इसी मॉडल पर काम कर रही है। भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया है और इन-स्पेस संस्था बनाई है, जो निजी कंपनियों को इसरो की प्रयोगशालाओं और लॉन्च पैड का उपयोग करने की अनुमति देती है। दुनिया के अंतरिक्ष बाजार में भारत की हिस्सेदारी वर्तमान में लगभग दो से तीन फीसदी है सरकार इसे बढ़ाकर दस फीसदी से अधिक करना चाहती है। यह लक्ष्य अकेले इसरो के दम पर पूरा नहीं हो सकता,इसके लिए सैकड़ों निजी कंपनियों की जरूरत है। यह भी माना जा रहा है कि ये स्टार्टअप्स देश के हजारों युवा इंजीनियरों को रोजगार दे रहे हैं, जिन्हें पहले इसरो में सीमित सीटों के कारण मौका नहीं मिल पाता था। वहीं इसरो कि दृष्टि में यह चिंताजनक है। सरकारी नीतियों के कारण इसरो अपने वैज्ञानिकों को निजी कंपनियों जितना भारी-भरकम पैकेज या सैलरी नहीं दे पाता। यदि इसरो के बहुत अधिक वरिष्ठ वैज्ञानिक अचानक पद छोड़ते है, तो कुछ समय के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाओं में देरी हो सकती है।
अब युवाओं और अनुभवी वैज्ञानिकों के सामने पहले की तुलना में कहीं अधिक आकर्षक वेतन,आधुनिक शोध सुविधाएं, नवाचार की स्वतंत्रता और वैश्विक स्तर पर कार्य करने के अवसर उपलब्ध हो रहे है। ऐसे में यदि प्रतिभाशाली वैज्ञानिक इसरो के बजाय निजी क्षेत्र का रुख करते है, तो यह केवल एक संस्थान का नहीं, बल्कि देश के दीर्घकालीन अंतरिक्ष कार्यक्रम का भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है। इससे भी बड़ी चिंता यह है कि यदि भारत में विकसित वैज्ञानिक प्रतिभाओं को पर्याप्त अवसर, संसाधन और प्रोत्साहन नहीं मिला, तो वे विदेशी निजी अंतरिक्ष कंपनियों या अन्य देशों के शोध संस्थानों की ओर आकर्षित हो सकते है। भारत पहले भी अपने अनेक उत्कृष्ट वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को वैश्विक संस्थानों तक पहुंचते हुए देख चुका है। यदि यही प्रवृत्ति अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती है, तो इसका प्रभाव भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और भविष्य की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं पर पड़ सकता है।
भारत में निजी क्षेत्र बढ़े या इसरो, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि क्या भारत ऐसा सशक्त अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर पाएगा,जहां इसरो,निजी उद्योग,स्टार्टअप्स और वैज्ञानिक प्रतिभाएं मिलकर देश को अंतरिक्ष महाशक्ति बनाने की दिशा में कार्य करें। अंततः चीन जाने से भी देश के वैज्ञानिकों को रोकना होगा। बहरहाल भारत की नई स्पेस पॉलिसी इसरो के लिए चुनौती है या युवाओं के लिए सुनहरा अवसर, इसका जवाब भारत के अंतरिक्ष भविष्य की दिशा और दशा तय करेगा।
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इसरो, निजी क्षेत्र और अंतरिक्ष में भारत का भविष्य
- by brahmadeep alune
- July 18, 2026
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