बांग्लादेश ने गांधी को नहीं माना तो वह टूट जाएगा
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बांग्लादेश ने गांधी को नहीं माना तो वह टूट जाएगा

सुबह सवेरे

बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कुछ वर्षों पहले कहा था कि महात्मा गांधी उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान के आदर्श थे और वे भी उस मार्ग पर चलना पसंद करती हैं। ऐसा कहकर शेख हसीना ने बांग्लादेश की राष्ट्रीय चेतना और उसकी ऐतिहासिक दिशा का एक बड़ा राजनीतिक संकेत दिया था। आज जब बांग्लादेश में शेख मुजीबुर रहमान की स्मृतियों को मिटाने, उनके प्रतीकों को धुंधलाकरने और उनके विचारों को विवादित बनाने की कोशिशें तेज़ होती दिख रही हैं, तब यह प्रश्न और गहरा हो जाता है कि क्या यह केवल सत्ता संघर्ष है, या फिर देश की आत्मा को बदलने की रणनीति है। महात्मा गांधी का जीवन हमें यह बताता है कि सत्ता का हस्तांतरण एक घटना हो सकती है, लेकिन समाज का नैतिक पुनर्निर्माण एक लंबी साधना है। जब दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण की औपचारिकताएँ चल रही थीं, देश आज़ादी का उत्सव मना रहा था, उस समय गांधी दिल्ली से पंद्रह सौ किलोमीटर दूर पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में सांप्रदायिकता की आग बुझाने में लगे थे। वे जानते थे कि आज़ादी का असली अर्थ केवल झंडा फहराना नहीं, बल्कि डर के बिना जीने का अधिकार है। जिस आज़ादी के साथ घर जलें, बहन-बेटियों के प्रति निर्ममता हो, मंदिर-मस्जिद तथा धर्म के नाम पर खून बहे,ऐसी आज़ादी अधूरी है। इसलिए गांधी का 15 अगस्त दिल्ली में नहीं, हिंसा के बीच बीता। यही गांधी का नैतिक नेतृत्व था, जो सत्ता से बड़ा था,किसी पद से ऊँचा था और भाषणों से कहीं अधिक प्रभावी था।

बंगाल की नोआखाली की धरती गांधी की उसी साधना की सबसे बड़ी परीक्षा बनी। वहाँ से सटे चौमुहानी स्टेशन के बाहर गांधी ने हिंदुओं और मुसलमानों से भाईचारा बनाए रखने की अपील की थी। यह कोई सामान्य भाषण नहीं था, यह उस समय के अंधकार में मनुष्यता की लौ थी। पर विडंबना देखिए कि जिस स्थान पर गांधी ने शांति का संदेश दिया, आज वहाँ उनकी कोई प्रतिमा नहीं, कोई शिलापट नहीं, कोई स्मृति-चिह्न नहीं। यह अनुपस्थिति उस स्मृति को मिटाने का संकेत है जो साम्प्रदायिक राजनीति को असहज करती है। क्योंकि गांधी का नाम आते ही धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों के हाथ काँपने लगते हैं। गांधी की उपस्थिति का अर्थ है,नैतिकता का दबाव, आत्मा की आवाज़ और हिंसा का प्रतिरोध। बांग्लादेश में नोआखाली में पढ़े-लिखे नौजवान और बुज़ुर्ग जानते हैं कि गांधी वहाँ आए थे। गांधी ने चार महीनों तक नोआखाली के गाँवों में पैदल भ्रमण किया, शांति समितियाँ बनाईं और लोगों को भरोसा दिया कि डर के आगे भी जीवन है। जे. बी. कृपलानी, सुचेता कृपलानी, डॉक्टर राममनोहर लोहिया और सरोजिनी नायडू जैसे नेताओं ने भी उनके साथ शांति बहाली की कोशिश की। यह यात्रा सिर्फ राजनीतिक नहीं थी, यह एक मानवीय पुनर्वास अभियान था, जहाँ घायल आत्माओं को मरहम चाहिए था,भाषण नहीं।

गांधी चार महीनों तक नंगे पाँव रहे। उनका कहना था कि नोआखाली एक श्मशान भूमि है, जहाँ हज़ारों बेगुनाह लोगों की समाधियाँ हैं। ऐसी जगह चप्पल पहनना मृत आत्माओं का अपमान है। यह प्रतीक बताता है कि गांधी हिंसा को आँकड़ों में नहीं देखते थे, वे हर मृत व्यक्ति को एक परिवार की टूटती दुनिया मानते थे। आज जब राजनीति लाशों को आँकड़ा और दंगों को रणनीति बना देती है, तब गांधी का यह भाव हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। आज बांग्लादेश की नई पीढ़ी की गांधी की स्मृतियों से कोई दिलचस्पी नहीं है और यही इस देश की सबसे बड़ी चुनौती भी बन गया है। आज बांग्लादेश में यदि गांधी को भुलाया जा रहा है और जिन्ना के विचारों का महिमामंडन बढ़ रहा है, तो यह केवल प्रतीकों का संघर्ष नहीं,बल्कि भविष्य का संकट है। जिन्ना का मार्ग राजनीतिक पहचान को धर्म की दीवार पर टिकाता है, जबकि गांधी का मार्ग मनुष्य को धर्म से ऊपर रखता है। जिन्ना की राजनीति विभाजन को समाधान बताती है, गांधी की राजनीति सह-अस्तित्व को सत्य मानती है।

जब कोई देश जिन्ना के रास्ते पर चलता है तो वहाँ नागरिक नहीं, समुदाय बनते हैं,वहाँ अधिकार नहीं, भय पैदा होता है। वहाँ लोकतंत्र नहीं, बहुसंख्यकवाद और कट्टरता का शासन बढ़ता है। कोई भी राष्ट्र जो गांधी को भूलता है, वह केवल एक व्यक्ति को नहीं भूलता,वह अहिंसा, सत्य, नैतिक साहस और मानवता की उस भाषा को भूलता है जो समाज को जोड़ती है। और जब राष्ट्र जोड़ने वाली भाषा भूल जाता है, तो टूटने वाली भाषाएँ तेज़ हो जाती हैं। घृणा, अफवाह, प्रतिशोध और हिंसा का प्रभाव बढ़ जाता है। ऐसे में देश का नष्ट होना केवल भौगोलिक टूटन नहीं होता, बल्कि वह धीरे-धीरे सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विनाश में बदल जाता है। बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वह मुजीब और गांधी की परंपरा में एक समावेशी राष्ट्र बनेगा या जिन्ना की दिशा में जाकर पहचान की राजनीति का कैदी बनेगा।बांग्लादेश का जन्म ही एक ऐतिहासिक चेतावनी थी। 1971 में पाकिस्तान का टूटना केवल सैन्य हार नहीं थी,वह विचारधारा की हार थी। पाकिस्तान ने जिन्ना की उस राजनीति को अपनाया जिसमें धर्म के नाम पर राष्ट्र गढ़ा गया,लेकिनसमानता और सम्मान की बुनियाद कमजोर रखी गई। परिणाम यह हुआ कि बंगाली अस्मिता,भाषा,संस्कृति और अधिकारों को दबाने का प्रयास किया गयाऔर वही दमन अंततः पाकिस्तान के विघटन का कारण बना। यह इतिहास बताता है कि जो राष्ट्र विविधता को कुचलता है,वह एक दिन खुद अपने ही बोझ से टूट जाता है।आज यदि बांग्लादेश भी उसी रास्ते पर बढ़ता है, तो उसका हश्र भी अलग नहीं होगा।गांधी कहते हैं कि राष्ट्र का निर्माण घृणा से नहीं,विश्वास से होता है,डर से नहीं,न्याय से होता है और हिंसा से नही,संवाद से होता है। यही समावेशी दृष्टि बांग्लादेश को टूटने से बचा सकती है।

कुछ ही दिनों बाद बांग्लादेश में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे समय में यह आशंका गहराती जा रही है कि जिन्ना की राह पर चलने वाले कट्टरपंथी दल सत्ता के केंद्र में आ सकते हैं। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं होगा,बल्कि बांग्लादेश की आत्मा,उसकी सामाजिक संरचना और उसके भविष्य की दिशा बदल देने वाला मोड़ साबित हो सकता है। कट्टर राजनीति का सबसे पहला हमला नागरिकता पर होता है। वहां लोग नागरिक नहीं रहते,समुदायों में बांट दिए जाते हैं। धर्म के नाम पर पहचान तय होती है,अधिकार घटते हैं और भय बढ़ता है। अल्पसंख्यक असुरक्षित होते हैं,बुद्धिजीवी चुप कर दिए जाते हैं,पत्रकार दबाव में आते हैं और असहमति को देशद्रोहकहकर कुचलने की कोशिश होती है। इस प्रक्रिया में लोकतंत्र केवल चुनावी औपचारिकता बनकर रह जाता है और सत्ता का चरित्र धीरे-धीरे तानाशाही में बदलने लगता है। बांग्लादेश के आगामी चुनाव केवल सत्ता-परिवर्तन नहींबल्कि देश की आत्मा और दिशा तय करने वाले हैं। यदि जमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी ताकतें सत्ता में प्रभावी भूमिका निभाती हैं,तो उनसे समावेशी राष्ट्र-निर्माण की उम्मीद करना कठिन होगा। ऐसी राजनीति अक्सर नागरिकको नहीं,धर्मको केंद्र में रखती है। परिणामस्वरूप समाज में अविश्वास,भय और ध्रुवीकरण बढ़ेगा।यह वही राह है जिसे इतिहास में जिन्ना की सोच के रूप में देखा जाता है,जहां राष्ट्र की पहचान धर्म से तय होने लगती है।

भारत के पड़ोसी देशों की राजनीतिक स्थिति आज एक गहरे संक्रमणकाल से गुजर रही है। कहीं लोकतंत्र कमजोर हो रहा है,कहीं सेना और कट्टरपंथ का प्रभाव बढ़ रहा हैतो कहीं आर्थिक संकट ने जनता को असहाय बना दिया है। ऐसे समय में गांधीजी की विचारधारा,अहिंसा,संवाद,सत्य,सहिष्णुता और जनशक्ति जैसे मूलभूत गुण इन देशों के लिए सिर्फ नैतिक उपदेश नहीं,बल्कि राजनीतिक स्थिरता का व्यावहारिक रास्ता बन सकती है।गांधीजी की राजनीति का मूल था,हिंसा नहीं,संवाद,बदला नहीं,मेल-मिलाप और सत्ता नहीं,सेवा। पड़ोसी देशों में आज जो संकट हैं,उनका समाधान केवल सैन्य ताकत या कठोर शासन से नहीं निकलेगा। गांधी का सत्याग्रह जनता को अहिंसक तरीके से अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने की शक्ति देता है। उनका सर्वधर्म समभाव बहुसंख्यकवाद और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ सामाजिक संतुलन पैदा करता है। जिन्ना ने राजनीतिक लाभ के लिए धर्म को राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला बनाया और इसी सोच ने विभाजन को जन्म दिया। धर्म आधारित राष्ट्र की यह अवधारणा बाहर से एकता का भ्रम देती है,लेकिन भीतर से समाज को संकीर्णता,असहिष्णुता और स्थायी अस्थिरता की ओर धकेल देती है। यही कारण है कि पाकिस्तानजो धर्म के नाम पर बना,वह जल्द ही आंतरिक विरोधाभासों में उलझ गया और 1971 में टूटकर बिखर गया।

इसके विपरीत गांधी ने धर्म को सत्ता की तलवार नहीं,बल्कि संस्कृति और नैतिकता की सुगंध की तरह देखा। उन्होंने विभिन्न आस्थाओं को जोड़कर सांस्कृतिक एकता के गुलदस्ते में संजोया और लोकतांत्रिक भारत की नींव रखी। गांधी का भारत किसी एक धर्म का नहीं,बल्कि हर नागरिक के सम्मान और अधिकार का भारत है। यही समावेशी दृष्टि भारत को विविधताओं के बावजूद मजबूत बनाती है। आज बांग्लादेश में धर्म को राजनीति का हथियार बनाया गया,तो सामाजिक विभाजन,अल्पसंख्यकों पर संकट और लोकतंत्र का क्षरण बढ़ेगा। गांधी ने यही चेतावनी दी थी की धर्म का इस्तेमाल यदि सत्ता के लिए होगा तो राष्ट्र टूटेगा,समाज बिखरेगा और मनुष्य भीतर से मर जाएगा।

 

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