नवभारत
कूटनीतिक रूप से यह माना जाता है की जब दो देशों के बीच गहरा अविश्वास हो तो किसी तीसरे देश द्वारा मध्यस्थता करना एक कूटनीतिक गलतियां जोखिम भरा कदम हो सकता है। ऐसे मामलों में तीसरा पक्ष अक्सर खुद फंस जाता है और तीसरे पक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लग जाते है। तीसरा देश यदि किसी एक के करीब है,तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जाएगा।पाकिस्तान ईरान का नजदीकी है जबकि इजराइल से उसके कोई संबंध नहीं है।अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखा गया है की जब तीसरा पक्ष दोनों से रणनीतिक संबंध रखता है,तो वह मध्यस्थता में अनिच्छुक हो सकता है क्योंकि यह उसके अपने हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। भारत और पाकिस्तान की नीति में यहीं अंतर है जो ईरान अमेरिका संघर्ष के दौरान देखने को मिला।
मध्य-पूर्व में तीन सत्ता केंद्र है,अरब शक्तियां,इज़राइल और ईरान।भारत के सभी के साथ घनिष्ठ और अच्छे संबंध हैं।इस वर्ष जनवरी के अंतिम सप्ताह में भारत के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पवन कपूर ने तेहरान की यात्रा की थी और ईरानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अली लारीजानी से मुलाकात की थी। इसके ठीक पहले भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषदके उस प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया था,जिसमें सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर ईरान की कार्रवाई की निंदा की गई थी। यह पूरा घटनाक्रम ईरान के खिलाफ अमेरिका की ओर से जारी सैन्य धमकियों के बीच हुआ था। दरअसल भारत अपने रणनीतिक हितों को देखते हुए भू-राजनीतिक तनाव के बीच ईरान के साथ अपने संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा था।भारत-ईरान संबंध ऐतिहासिक,सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है,जो मुख्य रूप से चाबहार बंदरगाह,क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और ऊर्जा सुरक्षा पर केंद्रित हैं। ईरान भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने का एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है,जबकि अमेरिकी प्रतिबंध और भू-राजनीतिक चुनौतियां द्विपक्षीय व्यापार में बाधाएं बनी हुई हैं।अगस्त 2021 में काबुल पर निर्णायक नियंत्रण के बाद तालिबान सरकार के साथ सम्बन्ध बनाएं रखने में ईरान अग्रणी देश था,भारत को इसका फायदा मिला और वर्तमान में भारत के तालिबान के साथ मजबूत रिश्ते है।
अरब और भारत के विदेश मंत्रियों की एक ऐतिहासिक बैठक 31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित की गई थी। इस बैठक की सह-अध्यक्षता संयुक्त अरब अमीरात ने की थी।इस कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने सूडान में संघर्ष,समुद्री सुरक्षा पर असर डालने वाली यमन की स्थिति,लेबनान में अस्थिरता और लीबिया और सीरिया में चल रही राजनीतिक प्रक्रियाओं सहित अन्य क्षेत्रीय तनाव के बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों को समग्र रूप से देखने पर यह बात रेखांकित होती है कि भारत और अरब देशों का इस क्षेत्र में स्थिरता,शांति और समृद्धि की शक्तियों को मजबूत करने में साझा हित है।भारत-अरब सहयोग मंच नेऊर्जा,पर्यावरण,कृषि,पर्यटन,मानव संसाधन विकास,संस्कृति और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर बल दिया तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी,अंतरिक्ष,स्टार्टअप और नवाचार सहित नए क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने पर सहमति जताई।वहीं प्रधानमंत्री ने आने वाले वर्षों में भारत-अरब साझेदारी के लिए अपने दृष्टिकोण की रूपरेखा प्रस्तुत की और दोनों पक्षों के लोगों के पारस्परिक लाभ के लिए व्यापार और निवेश,ऊर्जा,प्रौद्योगिकी,स्वास्थ्य सेवा और अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता की पुष्टि की थी।प्रधानमंत्री ने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता की दिशा में किए जा रहे प्रयासों में अरब लीग द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका के लिए सराहना भी की थी।
भारत के अरब देशों के साथ संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत,आर्थिक रूप से गहरे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। ये संबंध प्राचीन काल से चले आ रहे है,जब व्यापारी,विद्वान और राजनयिक अक्सर अरब सागर और भारत को पश्चिम एशिया और अरब प्रायद्वीप से जोड़ने वाले भूमि मार्गों से होकर ज्ञान और व्यापार का आदान-प्रदान करते थे। भाषा और धर्म के ताने-बाने के माध्यम से साझा सांस्कृतिक विरासत इन ऐतिहासिक संबंधों को निरंतर मजबूती प्रदान करती है।लगभग नब्बे लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों के हित,ऊर्जा सुरक्षाऔर व्यापार इन संबंधों के प्रमुख स्तंभ हैं। खाड़ी देशों में काम करने वाले ये भारतीय,भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा भेजते है तथा इस क्षेत्र की प्रगति एवं समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।भारत अरब दुनिया के दो प्रमुख देशों सऊदी अरब और यूएई के साथ रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से रक्षा,सुरक्षाऔर निवेश सहयोग लगातार बढ़ रहा है।भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग साठ फीसदी तेल और पचास फीसदी से अधिक उर्वरक अरब देशों से आयात करता है। सऊदी अरब और यूएई दोनों,भारत के बड़े व्यापारिक भागीदार देश है।सऊदी अरब ने आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय अपराध के खिलाफ भारत की लड़ाई का समर्थन किया है,जिसमें अपराधियों का प्रत्यर्पण भी शामिल है।भारत ने 2030 तक अरब जगत के साथ व्यापार को पांच सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।
भारत का अधिकांश बाह्य व्यापार स्वेज नहर,लाल सागर और अदन की खाड़ी से होकर गुजरता है। ओमान और सऊदी अरब से लेकर मिस्र,सूडान और अन्य देशों में भारत का महत्वपूर्ण निवेश है। भारत-अरब व्यापार संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। कोविड महामारी और वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों के दौरान भी भारत और अरब जगत के बीच व्यापार में वृद्धि जारी रही। अरब देशों के साथ साझेदारी खाद्य एवं ऊर्जा,वित्तीय सेवाएं,स्वास्थ्य एवं शिक्षा,सूचना प्रौद्योगिकी,नवीकरणीय ऊर्जा सहित स्टार्टअप और बड़े अवसंरचना परियोजनाओं जैसे लगभग हर क्षेत्र में फैली हुई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 से 26 फरवरी 2026 को इजराइल की अपनी दूसरी ऐतिहासिक राजकीय यात्रा की थी। यह यात्रा 2017 के उनके पहले दौरे के नौ साल बाद हुई और इससे दोनों देशों के बीच संबंधों को शांति,नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारीके स्तर तक ले जाया गया।भारत के लिए इज़राइल एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक,रक्षात्मक और तकनीकी साझेदार है,जो विशेष रूप से रक्षा आत्मनिर्भरता,कृषि,जल प्रबंधन और आतंकवाद विरोधी अभियानों में बिना किसी शर्त के सहायता प्रदान करता है। मेक इन इंडियाके तहत रक्षा सह-उत्पादन और एआई,साइबर सुरक्षा जैसे उन्नत क्षेत्रों में साझेदारी भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए महत्वपूर्ण है।भारत ने अरब जगत,ईरान और इजराइल के बीच तीव्र शत्रुता,भू-राजनीतिक तनाव और परस्पर विरोधी हितों के बावजूद तीनों पक्षों के साथ एक संतुलनकारी,व्यावहारिक और मजबूत संबंध बनाएं रखे है। इस नीति को रणनीतिक स्वायत्तताकहा जाता है,जहां भारत किसी एक गुट में शामिल होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तीनों से अलग-अलग संबंध रखता है।
ईरान और इज़राइल के बीच गहरा अविश्वास और ऐतिहासिक शत्रुता है,जो सीधे सैन्य संघर्ष और छद्म युद्ध के रूप में सामने आ रही है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से,ईरान के इस्लामी शासन ने इज़राइल को एक अवैध राज्यघोषित किया है और खुले तौर पर इसके विनाश की वकालत की है।इज़राइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है और उसे रोकने के लिए सैन्य अभियान चलाता रहा है।ईरान की वर्तमान शासन व्यवस्था का आधार ही इज़राइल-विरोध पर टिका है,जिससे कूटनीतिक संबंधों की बहाली बहुत मुश्किल है। वर्तमान परिस्थितियों में इन दोनों देशों के बीच मित्रता नहीं हो सकती,क्योंकि उनका अविश्वास वैचारिक,रणनीतिक और सैन्य स्तर पर बहुत गहरा है।
अमेरिका,इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष के दौरान ईरान और खाड़ी सहयोग परिषद के देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया है और अविश्वास गहरा गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा 28 फरवरी 2026 को ईरान पर शुरू किए गए संयुक्त हमलों के बाद,ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर जवाबी ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे।सऊदी अरब और यूएई को यह चिंता सता रही है कि ईरान की आक्रामकता उनके देशों की स्थिरता के लिए खतरा है। इन हमलों के बाद सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंधों में फिर से खटास आ गई है,जबकि 2023 के बीजिंग समझौते से संबंधों में सुधार की उम्मीद जगी थी। खाड़ी देश अब ईरान के खिलाफ सक्रिय रक्षाकी ओर बढ़ रहे है,जिसका मतलब है कि वे अपने नागरिकों और बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए सैन्य जवाबी कार्रवाई का अधिकार सुरक्षित रख रहे है। ईरान अमेरिका के बीच युद्दविराम की घोषणा का स्वागत करते हुए संवाद से इस समस्या का हल ढूंढने की भारत की नसीहत,भारत की संतुलित और रणनीतिक स्वायत्ता की नीति का परिचायक है। इससे भारत के अरब शक्तियों,इज़राइल और ईरान से संबंध मजबूत बने रहेंगे,चाहे भविष्य में इन देशों के आपसी सम्बन्ध कितने भी खराब दौर में प्रवेश क्यों न कर जाएं।
भारत की विदेश नीति उसकी भौगोलिक परिस्थितियों और 1947 में आज़ादी के बाद से चली आ रही कूटनीतिक परंपराओं पर आधारित है।भारत आमतौर पर किसी गुट में शामिल होनेया खुले तौर पर किसी का पक्ष लेने से परहेज करता है।बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच अपनी स्थिति और हितों को मज़बूत करने के उद्देश्य से इन देशों को अपनी नीति में लचीलापन बनाएं रखना ज़रूरी है।इजरायल-फिलिस्तीन या ईरान-अमेरिका के मामलों में मध्यस्थता के प्रयास असफल होते रहे है,इसका प्रमुख कारण इन पक्षों में अविश्वास का स्तर बहुत ऊंचा होना है। जब अविश्वास बहुत गहरा हो तो मध्यस्थता की सफलता दर कम होती है। ऐसे में एक कूटनीतिक गलती करने के बजाय,अक्सर तटस्थ रहना या दोनों पक्षों को स्वयं बातचीत के लिए प्रोत्साहित करना ही समझदारी भरा कदम माना जाता है।










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