मध्यपूर्व को चाहिए मजबूत मध्यस्थ
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मध्यपूर्व को चाहिए मजबूत मध्यस्थ

    जनसत्ता                  

                           

किसी भी जटिल अंतर्राष्ट्रीय विवाद के समाधान के लिए पहले विश्वास निर्माण आवश्यक है,तभी सार्थक और स्थायी समाधान संभव हो सकता है। इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच हुई बातचीत की असफलता का एक प्रमुख कारण यह था कि दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद गहरे अविश्वास को दूर करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। ईरान और अमेरिका के संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे है,जिनमें राजनीतिक, सामरिक और वैचारिक मतभेद गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में बैक-चैनल कूटनीति और छोटे-छोटे समझौते पर आगे बढ़ने की जरूरत थी लेकिन सीधे औपचारिक वार्ता शुरू कर दी गई और यहीं कारण था की  इक्कीस घंटे की बातचीत के बावजूद,संवाद सकारात्मक दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया और वार्ता निष्फल रही। दोनों पक्ष एक दूसरे की मांगों को लेकर सहमत नहीं हुए और शांति की उम्मीदें खत्म हो गई।

अमरीका के प्रस्ताव में ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने, मिसाइल क्षमता घटाने,होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने,क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को समर्थन कम करने और चरणबद्ध प्रतिबंधों में ढील स्वीकार करने की मांग की गई थी। ईरान की जमीन पर यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह से रोकने और संवर्धित किए गए यूरेनियम को सौंपने की मांग प्रमुखता से की गई,इजरायल और अमेरिका को आशंका है कि इस सामग्री का इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में हो सकता है। ईरान भविष्य में सैन्य कार्रवाई न करने की गारंटी देने,युद्ध क्षतिपूर्ति का भुगतान करने,सहयोगी समूहों सहित सभी मोर्चों पर शत्रुता समाप्त करने और होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को पूर्ण मान्यता देने की मांग कर रहा है।

अमेरिका के सहयोगी देश ईरान को सामरिक,राजनीतिक और वैचारिक कारणों से खतरनाक मानते है। उन्हें आशंका है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बिगाड़ सकता है,वहीं विध्वंसक हथियार अलगाववादी समूहों को सौंपकर सुरक्षा चुनौतियां बढ़ा सकता है।  ईरान,इराक,सीरिया और लेबनान में विभिन्न जातीय और क्षेत्रीय समूहों समूहों को समर्थन देता है,जिसे अमेरिका और उसके सहयोगी अस्थिरता फैलाने वाला मानते है। इससे क्षेत्र में परोक्ष युद्ध और तनाव बढ़ता है। ईरान का इज़राइल विरोधी रुख और सऊदी अरब के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता भी चिंता का विषय है। इससे क्षेत्रीय संघर्ष की संभावना बनी रहती है। खाड़ी क्षेत्र में तेल टैंकरों पर हमलों और समुद्री मार्गों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों ने भी ईरान की छवि को जोखिमपूर्ण बनाया है। इन कारणों से अमेरिका के सहयोगी देशों को लगता है कि ईरान की नीतियां क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। ईरान अमेरिका और  इजराइल को अपने प्रमुख विरोधी के रूप में देखता है। वह अमेरिका को हस्तक्षेपकारी शक्ति मानता है,जिसने उसके आंतरिक मामलों और क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित किया है। वहीं इजराइल को ईरान एक अवैध राज्य और अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। ईरान का मानना है कि ये दोनों देश मध्यपूर्व में उसकी शक्ति और प्रभाव को सीमित करना चाहते है। इसलिए वह प्रतिरोध की नीति अपनाते हुए क्षेत्र में अपने सहयोगियों के माध्यम से संतुलन बनाएं रखने का प्रयास करता है।

इस्लामाबाद में बातचीत विफल होने के बाद एक बार फिर ईरान को लेकर संकट गहरा गया है।  यदि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष भीषण रूप ले लेता है,तो इसके व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक परिणाम हो सकते है। मध्यपूर्व में अस्थिरता अत्यधिक बढ़  सकती है और कई देश इस संघर्ष में सीधे या परोक्ष रूप से शामिल हो सकते हैं। इससे एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की संभावना उत्पन्न हो सकती है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ेगा। फारस की खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर विश्व का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात होता है। संघर्ष की स्थिति में इन मार्गों के बाधित होने से तेल की कीमतों में भारी वृद्धि होगी, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और समुद्री सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जहाजों पर हमलें,बंदरगाहों की असुरक्षा और बीमा लागत में वृद्धि से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है। मानवीय संकट भी गहरा सकता है,जिसमें बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन,जनहानि और बुनियादी ढांचे का विनाश शामिल होगा। यह संघर्ष वैश्विक शक्तियों के बीच तनाव बढ़ाकर विश्व शांति के लिए गंभीर खतरा बन सकता है और कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को और कठिन बना सकता है।

ईरान के साथ युद्ध या तीव्र सैन्य टकराव के बाद ट्रम्प के सामने चुनौतियां बढ़ गई है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है या अपेक्षित सफलता नहीं मिलती,तो घरेलू स्तर पर उनकी नीतियों की आलोचना तेज हो सकती है। अमेरिकी जनता आमतौर पर लंबे और महंगे युद्धों से असहज रहती है,जिससे राजनीतिक दबाव बढ़ता है। युद्ध के कारण तेल की कीमतों में वृद्धि,वैश्विक बाजारों में अस्थिरता और रक्षा खर्च में बढ़ोतरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर डाल सकती है। इससे महंगाई और वित्तीय असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ईरान पर हमलें को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि और कूटनीतिक संबंध प्रभावित हो रहे है तथा उसके कई सहयोगी देश युद्ध से असहमत दिखाई दे रहे है,इससे अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे है।  ऐसे में ट्रम्प ईरान पर हमलें को सही ठहराने के लिए ज्यादा आक्रमक हो सकते है और इससे मध्यपूर्व में स्थितियां और ज्यादा बिगड़ सकती है। 

खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी हितों के लिए चीन और रूस महत्वपूर्ण चुनौतियां है। यह क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों,समुद्री मार्गों और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है,जहां  लंबे समय से अमेरिका का प्रभाव रहा है। चीन बेल्ट एंड रोड के माध्यम से खाड़ी देशों में निवेश,बुनियादी ढांचा निर्माण और ऊर्जा साझेदारी को मजबूत कर रहा है। वह सऊदी अरब,ईरान और अन्य देशों के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाकर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है,जिससे अमेरिका  के आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव के लिए चुनौतियां बढ़ गई है। अमेरिका के एक और मजबूत प्रतिद्वंदी रूस और ईरान के गहरे रणनीतिक हित है। रूस ईरान के साथ रणनीतिक सहयोग के जरिए क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। रूस हथियारों की आपूर्ति और ऊर्जा सहयोग के माध्यम से भी खाड़ी देशों में प्रभाव स्थापित कर रहा है।  चीन और रूस की सक्रियता से खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के लिए अपने पारंपरिक प्रभुत्व को  बनाएं रखना कठिन हो रहा है। यह प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय राजनीति को और जटिल तथा अस्थिर बना रही है।

यदि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की स्थिति कमजोर पड़ती है तो इसके व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। शक्ति संतुलन में बदलाव आएगा,जहां चीन और रूस अपना प्रभाव  तेजी से बढ़ाने का प्रयास करेंगे। इससे खाड़ी क्षेत्र अधिक प्रतिस्पर्धात्मक बन सकता है। इसके साथ ही सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,कतर और अमेरिका के अन्य साझेदार देशों की  सुरक्षा रणनीति में परिवर्तन आ सकता है। वे अमेरिका पर निर्भरता कम कर नए साझेदारों की ओर झुक सकते है,जिससे पारंपरिक गठबंधनों में बदलाव हो सकता है। इसका असर ऊर्जा बाजार पर भी पड़ेगा। यदि सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होती है,तो तेल आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है,जिससे वैश्विक तेल कीमतों में अस्थिरता बढ़ेगी। ट्रम्प और नेतन्याहू यह कभी नहीं चाहेंगे की इस क्षेत्र में ईरान का प्रभाव बढ़ने लगे,इससे शक्ति संतुलन और अधिक असंतुलित हो सकता है। यह स्थिति क्षेत्रीय संघर्षों,कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक अनिश्चितता को बढ़ा सकती है,जो विश्व शांति और आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौतीपूर्ण होगी।

मध्यपूर्व को युद्द के खतरें से बाहर निकालने के लिए संवाद और विश्वास बहाली बहुत आवश्यक है। अंतर्राष्ट्रीय तनावों को समाप्त करने के लिए मध्यस्थता एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक साधन है,किंतु इसकी सफलता काफी हद तक उस मध्यस्थ देश की शक्ति,विश्वसनीयता और प्रभाव पर निर्भर करती है। केवल वार्ता की मेज पर पक्षों को बैठा देना पर्याप्त नहीं होता,बल्कि यह भी आवश्यक है कि मध्यस्थ देश समझौते के क्रियान्वयन की गारंटी दे सके। अमेरिका में कैम्प डेविड समझौता इज़राइल और मिस्र  के बीच करवाया था और उसकी उसकी गारंटी भी दी। 17 सितंबर,1978 को संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता से मिस्र और इज़राइल के बीच संपन्न हुए कैंप डेविड समझौते मध्य पूर्व के इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना मानी जाती है। तीन दशकों तक मिस्र इज़राइल का सबसे बड़ा शत्रु रहा था,जिसने चार युद्ध लड़े थे और अखिल अरब और फ़िलिस्तीनी आंदोलनों का समर्थन किया था। इसके बावजूद अमेरिकी प्रभाव से कैंप डेविड समझौता हुआ और इसके बहुत दूरगामी रणनीतिक और कूटनीतिक  परिणाम हुए। अमेरिका के मुकाबले पाकिस्तान की स्थिति बहुत कमजोर है। पाकिस्तान भले ही कूटनीतिक रूप से पहल कर अमेरिका और ईरान को वार्ता के लिए एक मंच पर ले आया था,लेकिन उसके पास इतना प्रभाव नहीं है कि वह समझौते के उल्लंघन की स्थिति में किसी पक्ष पर दबाव बना सके। उसकी आंतरिक आर्थिक चुनौतियां और सीमित वैश्विक प्रभाव उसे एक प्रभावी गारंटर बनने से रोकते है।

ईरान और अमेरिका के बीच संभावित युद्ध को रोकने में यूरोप की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। यूरोपीय संघ कूटनीति,आर्थिक संतुलन और बहुपक्षीय वार्ता के माध्यम से दोनों पक्षों के बीच सेतु का काम कर सकता है। यूरोपीय देश परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर सकते है,जिससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित किया जा सके और अमेरिका की चिंताओं को कम किया जा सके। यूरोप,ईरान के साथ सीमित आर्थिक सहयोग बनाएं रखते हुए उसे वार्ता की मेज पर बनाएं रखने की कोशिश कर सकता है। यूरोप बैक-चैनल कूटनीति के जरिए दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के प्रयास कर सकता है। फ्रांस,जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देश पहले भी मध्यस्थ की भूमिका निभा चुके है और भविष्य में भी तनाव कम करने में सहायक हो सकते है। वहीं पुतिन के द्वारा मध्यस्थता की पेशकश भी महत्वपूर्ण है। रूस,ईरान का करीबी साझेदार होने के कारण उस पर प्रभाव रखता है और अमेरिका के साथ भी संवाद बनाएं हुए है। रूस के इजराइल के साथ भी अच्छे सम्बन्ध है। रूस की भूमिका भी शांति वार्ता को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकती है। इस प्रकार,यूरोप की संतुलित कूटनीति और रूस की सक्रिय मध्यस्थता मिलकर युद्ध की संभावना को कम कर सकती है और शांतिपूर्ण समाधान का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। फ़िलहाल इसकी बहुत जरूरत है।

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