मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं
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मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं

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महिला दिवस के अवसर पर पॉलिटिक्सवाला का यह विशेष अंक मातृशक्ति को समर्पित है। भारतीय संस्कृति में नारी को सृजन, शक्ति और संवेदना का प्रतीक माना गया है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए हमने इस अंक में मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रही नौ प्रेरणादायी महिलाओं को स्थान दिया है। ये महिलाएँ अपने-अपने क्षेत्र में उसी तरह परिवर्तन की शक्ति बनकर उभरी हैं, जैसे देवी दुर्गा के नौ रूप समाज की रक्षा और उन्नति का संदेश देते हैं। शिक्षा,सामाजिक सेवा, जनजागरण, संस्कृति, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में इन नौ हस्तियों का कार्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है,बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। दूर-दराज़ के गाँवों से लेकर शहरों तक,इन महिलाओं ने अपने साहस, संवेदनशीलता और समर्पण से यह सिद्ध किया है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो सीमाएँ मायने नहीं रखती। इनके प्रयासों से न केवल अनेक लोगों का जीवन बदला है, बल्कि मध्यप्रदेश के सामाजिक विकास को भी नई दिशा मिली है। यह उपलब्धियों का विवरण नहींबल्कि उस परिवर्तनकारी शक्ति की कहानी है जो चुपचाप समाज को बेहतर बनाने में लगी हुई है। इन महिलाओं के कार्यों से स्पष्ट होता है कि विकास केवल नीतियों से नहीं, बल्कि समाज के भीतर से उठने वाले ऐसे समर्पित प्रयासों से संभव होता है।इस विशेष अंक की तैयारी में हमें प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ। विशेष रूप से सागर से पंकज सोनी और गंजबासौदा से डॉ. मणिमोहन मेहता ने इन प्रेरक व्यक्तित्वों तक पहुँचने और उनके कार्यों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पॉलिटिक्सवाला का यह प्रयास मातृशक्ति को नमन करने के साथ-साथ उन अनगिनत महिलाओं को भी सम्मान देने का एक छोटा सा प्रयास है,जो अपने कार्यों से मध्यप्रदेश को और अधिक संवेदनशील, सशक्त और सुंदर बना रही हैं।

डॉ.सरोज गुप्ता,सागर

बुंदेलखंड विश्वकोष (इनसाइक्लोपीडिया) तैयार करने का जूनून

मन समर्पित,तन समर्पित,बुंदेली भाषा-साहित्य और संस्कृति के लिए ये जीवन समर्पित।पं.दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य अग्रणी महाविधालय की प्राचार्य डॉ सरोज गुप्ताबुंदेली भाषा-साहित्य और संस्कृति  को शिद्दत से सहेजने में जुटी है।20 वर्षों की बुंदेली शब्द संकलन यात्रा के बाद उन्होंने प्रमाणिक वृहद बुंदेली शब्दकोष तैयार कर लिया है,जिसे उत्तरप्रदेश भाषा संस्थान लखनऊ ने प्रकाशित किया है।अब डॉ.सरोज गुप्ता 40 खंड वाले बुंदेलखंड विश्वकोष (इनसाइक्लोपीडिया) की तैयारी कर रही हैं।इसके तीन भाग लोक साहित्य,बुंदेली भाषा और पारंपरिक देशी चिकित्सा पद्धति तैयार हो चुके है। बुंदेलखंड के इस इससाक्लोपीडिया में इसके इतिहास से लेकर आजतक का ऐसा कोई विषय नहीं होगा जिसकी जानकारी उपलब्ध न हो। बुदेंलखंड विश्वकोष पर एक बेबसाइट bundelkhandvishwakosh.com भी तैयार की गई है। इसमें कोई भी व्यक्ति बुंदेलखंड से संबंधित जानकारी जोड़ सकता है। बुंदेली भाषा और शब्दकोष के लिए वे एक और बड़ा काम करने जा रही हैं।ये काम है त्रिभाषी बुंदेली लोकशब्दकोष। साढ़े सात सौ पेज के इस शब्दकोष में पन्द्रह हज़ार शब्दों को बुंदेली,हिन्दी और अंग्रेजी भाषा अर्थ और वाक्य-प्रयोग सहित दिया गया है,जिसका प्रकाशन केन्द्रीय हिंन्दी संस्थान आगरा के द्वारा किया जा रहा है।  डॉ.सरोज गुप्ता अब तक 2 कविता संग्रहों ब्रह्मवादिनी  और सूर्य सावित्री सहित 55 पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं।  इसी वर्ष से वे बुंदेलखंड एक दृष्टि नाम की बार्षिक पत्रिका भी शुरू करने जा रही हैं,ये किताब छप चुकी है जल्दी ही पाठकों के हाथों में होगी। डॉ.गुप्ता का कहना है कि अंतिम साँस तक वे बुंदेली भाषा की मिठास को लोकव्यापी करने के प्रयास में जुटी रहेंगी।

डॉ.शरद सिंह,सागर

पिछले पन्ने की औरतें उपन्यास ने खींचा राई नृत्य और बेड़ियां समाज की ओर ध्यान

डॉ.शरद सिंह के चर्चित उपन्यास “पिछले पन्ने की औरतें” के अब तक तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इस उपन्यास पर दक्षिण भारत, लखनऊ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध कार्य भी किया जा रहा है। इस कृति के माध्यम से समाज का ध्यान बेडिया समाज और राई नृत्य की ओर आकर्षित हुआ है। इससे लोगों में इस समाज के प्रति सहानुभूति भी बढ़ी है और कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने उनकी मदद करने का भरोसा दिया है।डॉ. सिंह बताती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह क्षण था जब बेडिया समाज के एक बच्चे ने यह उपन्यास अपनी मां को पढ़कर सुनाया और उसकी मां ने कहा कि इसमें लिखा हर शब्द उनके जीवन की सच्चाई है। डॉ. सिंह के अनुसार यह किसी भी बड़े पुरस्कार से कम नहीं है।उन्होंने सरकार से अपील की है कि राज्य के विश्वविद्यालयों में राई नृत्य को परफॉर्मिंग आर्ट के विषय के रूप में शामिल किया जाए। उनका मानना है कि सरकार का छोटा-सा प्रयास भी राई नृत्य और बेडिया समाज को सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने की नई दिशा दे सकता है।डॉ.शरद सिंह ने अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास भी लिखे हैं,जिनमें “कसवाई सिमोन”,“पचकोड़ी” और“शिखंडी” प्रमुख हैं। उनके उपन्यास “शिखंडी” का अनुवाद कन्नड़ और मराठी भाषाओं में भी हो चुका है।डॉ.सिंह का कहना है कि अब समाज का भी कर्तव्य है कि वह बेडिया समाज को सम्मानजनक पहचान दिलाने के लिए मिलकर प्रयास करे। सरकार और समाज दोनों के छोटे-छोटे प्रयास इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

डॉ.कामिनी जैन,शिक्षाविद्,नर्मदापुरम

उच्च शिक्षा,नेतृत्व और नवाचार बेटियों का जीवन संवारने का जूनून

डॉ.कामिनी जैन पिछले  बारह वर्षों से नर्मदापुरम की सबसे बड़े महाविद्यालय की प्राचार्य है के रूप में कार्यरत हैं। उनके नेतृत्व में महाविद्यालय ने शिक्षा,खेल, सामाजिक सेवा और अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। उनके दूरदर्शी प्रयासों ने नर्मदापुरम और आसपास के क्षेत्र की लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता के नए अवसर खोले हैं।प्राचार्य कामिनी जैन के नेतृत्व में महाविद्यालय की छात्राओं ने राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। उनका ध्यान बेटियों के सर्वांगीण विकास पर होता है।महाविद्यालय में खेल सुविधाओं को विशेष रूप से विकसित किया गया है। यहाँ बिलियर्ड्स और मलखंब जैसे खेलों की सुविधाएँ उपलब्ध हैं तथा वर्ष 2026 में राज्य स्तरीय मलखंब प्रतियोगिता का सफल आयोजन भी किया गया। पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण की दिशा में भी महाविद्यालय लगातार सक्रिय है। यहाँ औषधीय उद्यान, रसोई उद्यान, गुलाब उद्यान और अलंकृत उद्यान विकसित किए गए हैं। इको क्लब द्वारा ईकोब्रिक्स का निर्माण तथा वनस्पति विभाग द्वारा सीड बैंक की स्थापना जैसे नवाचार भी किए गए हैं।महाविद्यालय का पुस्तकालय पूरी तरह स्वचालित है, जिसमें 60 हजार से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं। साथ ही संभाग का डिजिटल स्टूडियो, इतिहास विभाग में म्यूजियम और गांधी अध्ययन केंद्र भी स्थापित किए गए हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, जैविक खाद, मशरूम उत्पादन और बायोगैस उत्पादन की इकाइयाँ भी संचालित की जा रही हैं।कामिनी जैन का मानना है कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का साधन है। उनके नेतृत्व में महाविद्यालय शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता का एक सशक्त केंद्र बनकर उभरा है,जो क्षेत्र की बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

पद्मा चौगांवकर,गंजबासौदा,

बाल साहित्यकार क,ख,ग,घ

पद्मा जी पिछले छः दशकों से हिन्दी और मराठी भाषा में बच्चों के लिए लगातार कविता,कहानी,नाटक और उपन्यास लिख रही हैं। पुरस्कार,सम्मान और यश की कामना से दूर रहकर उनका रचनाकार मन बार बार बच्चों की दुनिया में लौटता है और हर बार अपने नए सृजन के साथ वे अपने बाल पाठकों को विस्मय से भर देती हैं।पद्मा चौगांवकर द्वारा रचित टैंगटाउनकी एक पुरस्कृत अंगिका कहानी हैजिसके केंद्र में मणिपुर की पारंपरिक मार्शल आर्ट कला थांग-टाहै। यह कहानी मणिपुर की ऐतिहासिक युद्ध कला तलवार और भाला पर आधारित है। यह न केवल एक खेल या रक्षा तकनीक हैबल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा भी है।लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से बच्चों और युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक खेलों के महत्व से अवगत कराने का प्रयास किया है।पद्मा जी ने इस कहानी को अंगिका बिहार और झारखंड के अंग क्षेत्र की भाषा में लिखकर भाषाई विविधता और अंतर-सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा दिया है।पद्मा चौगांवकर बच्चों में ईमानदारी,साहस और सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्यों की सीख देती हैं।

उनकी कहानियां बच्चों को सही-गलत का भेद समझाकर एक आदर्श नागरिक बनने की प्रेरणा देती हैं।रोचक कथाओं और कविताओं के माध्यम से वे बच्चों की कल्पना शक्ति को विस्तार देती हैं। वे लोककथाओं और ऐतिहासिक कहानियों के जरिए बच्चों को अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं से जोड़े रखने का निरंतर प्रयास कर रही है।

सीमा अलावा

कर्तव्य और सृजन का सुंदर संगम

मध्यप्रदेश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की पुलिस उपायुक्त सीमा अलावा की पहचान एक ऐसी पुलिस अधिकारी के रूप में है जो बेहद विनम्र है,कर्तव्य की प्रति बेहद सजग है और सोशल पुलिसिंग के लिए  जनता के बीच बेहद लोकप्रिय है।महिला सुरक्षा से जुड़े अभियानों, स्कूल-कॉलेजों में आयोजित जागरूकता कार्यक्रमों और युवाओं के साथ संवाद के माध्यम से उन्होंने पुलिस और समाज के बीच विश्वास का रिश्ता मजबूत करने का प्रयास किया है।इंदौर सहित मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों पर अपने कार्यकाल के दौरान सीमा अलावा ने यह साबित किया है कि एक पुलिस अधिकारी केवल कानून का रक्षक ही नहीं होता, बल्कि समाज का मार्गदर्शक भी हो सकता है। वे मानती हैं कि अपराध को रोकने के लिए समाज की सहभागिता और जागरूकता उतनी ही आवश्यक है जितनी प्रशासनिक सख्ती।

उनके व्यक्तित्व का एक और अत्यंत रोचक और प्रेरक पक्ष उनकी कला-रुचि है। सीमा अलावा पारंपरिक  पिथौरा कला की सुंदर चित्रकारी भी करती हैं। पिथौरा कला मध्यभारत की समृद्ध जनजातीय परंपरा से जुड़ी एक विशिष्ट चित्रशैली है,जिसमें रंगों के माध्यम से जीवन,प्रकृति और संस्कृति की विविध छवियां उकेरी जाती हैं। सीमा अलावा के बनाए चित्र अपनी जीवंतता,रंगों की विविधता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के कारण विशेष रूप से सराहे जाते हैं।

उनकी चित्रकला की उत्कृष्टता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके बनाए कुछ चित्र मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव और राज्यपाल द्वारा महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को भेंट किए गए। यह किसी भी कलाकार के लिए गर्व का विषय होता है और यह उनकी रचनात्मक प्रतिभा की बड़ी पहचान भी है।इस प्रकार सीमा अलावा का व्यक्तित्व कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी और संवेदनशील कलाकारदोनों रूपों का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है। उनकी कार्यशैली यह प्रेरणा देती है कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ कला और संवेदना को भी जीवन में स्थान दिया जा सकता है।

नेहा पाटीदार

अफ़ीम पर शोध से किसान परिवारों का जीवन बचाने की कोशिश

 नेहा पाटीदार मध्यप्रदेश के  नीमच जिले की रहने वाली एक किसान की बेटी और बहू हैं। ग्रामीण परिवेश से आने के बावजूद उन्होंने शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। समाजशास्त्र में एम.ए. करने के बाद उन्होंने अफीम की खेती करने वाले किसानों के परिवारों की सामाजिक परिस्थितियों पर गहन अध्ययन किया और इस विषय पर  विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से शोध कार्य किया।नीमच और आसपास के क्षेत्रों में अफीम की खेती लंबे समय से किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन रही है। लेकिन इसके साथ जुड़ी एक गंभीर सामाजिक समस्या यह भी रही है कि कई बार अफीम और उससे बने नशे का प्रभाव किसानों के परिवारों तक पहुँच जाता है, जिससे सामाजिक और पारिवारिक जीवन प्रभावित होता है। नेहा पाटीदार ने अपने शोध के माध्यम से इसी संवेदनशील मुद्दे को समझने और समाज के सामने लाने का प्रयास किया।उनका स्पष्ट संदेश है,अफीम की खेती कीजिए,लेकिन नशे को अपने परिवार की जिंदगी बर्बाद न करने दीजिए।अपने अध्ययन और जनजागरूकता के प्रयासों के माध्यम से उन्होंने किसानों और उनके परिवारों को यह समझाने की कोशिश की है कि खेती एक वैध और आवश्यक आजीविका हो सकती है,लेकिन नशे की लत समाज और परिवार दोनों के लिए विनाशकारी है। नेहा पाटीदार के प्रयासों की व्यापक सराहना हो रही है। उन्होंने केवल शोध तक ही अपने कार्य को सीमित नहीं रखा, बल्कि लोगों के बीच जाकर जागरूकता फैलाने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके प्रयासों से कई परिवारों में इस विषय पर नई सोच विकसित हो रही है और लोग नशे से दूर रहने के प्रति अधिक सचेत हो रहे हैं।एक किसान परिवार से निकलकर शिक्षा,शोध और सामाजिक जागरूकता को अपना माध्यम बनाने वाली नेहा पाटीदार आज इस बात की प्रेरक मिसाल हैं कि यदि संकल्प मजबूत हो तो व्यक्ति अपने समाज की समस्याओं को समझकर उनके समाधान की दिशा में सार्थक योगदान दे सकता है।

सरिता चौरे,भोपाल

संघर्ष और साहस की मिसाल- अंतर्राष्ट्रीय पैरा जूडो खिलाड़ी

सरिता चौरे का जीवन इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प और मेहनत की भावना हो,तो कोई भी शारीरिक चुनौती सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती। उनका संघर्ष और उपलब्धियां आज अनेक युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिबाधित पैरा जूडो खिलाड़ी सरिता चौरे का जन्म नर्मदा पुरम के ग्राम पांजरा कला में हुआ उनकी माता श्रीमती कृष्णा चौरे और पिता श्री लखन लाल चौरे हैं सरिता जन्म से ही दृष्टिबाधित है सरिता की दो बड़ी बहनें ज्योति और पूजा भी दृष्टिबाधित है और वे दोनों भी राष्ट्रीय दृष्टिबाधित पैरा जूडो खिलाड़ी हैं। वर्तमान में वे राष्ट्रीय अभिलेखागार क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल में एमटीएस के पद पर कार्यरत है। जूडो सरिता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर चुकी है। वे  2019 इंग्लैंड में कॉमनवैल्थ ब्लाइंड पैरा जूडो चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी है। सरिता को बचपन से ही खेलने का शौक था जिसमें उनके माता-पिता ने उनका पूरा सहयोग किया । उन्होंने जूडो खेलने की शुरुआत सन 2018 से की तब से लेकर अब तक उन्होंने कई राष्ट्रीय दृष्टिबाधित पैरा जोड़ो चैंपियनशिप में अनेक मेडल प्रदेश के लिए जीते हैं। आजकल सरिता दृष्टिबाधित प्रतिभाओं को निखारने का अभियान चला रही है।

सुनीता बुके

आदिवासी बाहुल्य खंडवा जिले में बच्चों का भविष्य संवारने का जूनून 

मध्यप्रदेश का खंडवा जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, जहां शिक्षा को लेकर अनेक चुनौतियाँ आज भी मौजूद हैं। ऐसे क्षेत्र में यदि कोई शिक्षक समर्पण और लगन के साथ शिक्षा की मशाल जलाने का संकल्प ले, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इसी समर्पण और प्रतिबद्धता की मिसाल हैं सुनीता बुके, जो वर्तमान में खंडवा जिले में जनशिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। सुनीता बुके ने इंदौर के प्रतिष्ठित होलकर विज्ञान महाविद्यालय से बायोकेमेस्ट्री में एम.एससी. की पढ़ाई पूरी की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके सामने कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने एक अलग और चुनौतीपूर्ण रास्ता चुना। उन्होंने तय किया कि वे आदिवासी क्षेत्रों में जाकर शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाएँगी और बच्चों के भविष्य को संवारने का प्रयास करेंगी।जनशिक्षक के रूप में सुनीता बुके गांव-गांव जाकर बच्चों और उनके अभिभावकों को शिक्षा का महत्व समझाती हैं। वे बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करती हैं, उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए मार्गदर्शन देती हैं और यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास करती हैं कि उन्हें सरकार की विभिन्न शैक्षणिक योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके। इसके साथ ही वे शिक्षा के क्षेत्र में नए-नए नवाचारों को अपनाने और लागू करने की दिशा में भी सक्रिय रहती हैं। खंडवा जैसे आदिवासी अंचल में सुनीता बुके आज एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी हैं। उनकी मेहनत और समर्पण ने अनेक बच्चों के जीवन में नई उम्मीद जगाई है। उनके प्रयासों से कई परिवारों में शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हुई है और बच्चे पढ़ाई की ओर अधिक उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे हैं। सुनीता बुके का कार्य यह दर्शाता है कि यदि एक शिक्षक समाज के प्रति समर्पित हो, तो वह केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य को नई दिशा दे सकता है।

डॉ. कांता वर्मा

राष्ट्रीय सेवा योजना से नक्सल प्रभावित रहे लांजी,बालाघाट में जागरूकता की मशाल जलाने के अभियान की अगुआ 
मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का लांजी क्षेत्र लंबे समय तक गरीबी,बेरोजगारी और नक्सली गतिविधियों के कारण चर्चा में रहा है। ऐसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का कार्य करना किसी मिशन से कम नहीं है। इसी मिशन को आगे बढ़ा रही हैं डॉ. कांता वर्माजो लांजी के शासकीय महाविद्यालय में पदस्थ हैं। वे राष्ट्रीय सेवा योजना के माध्यम से आदिवासी अंचलों में शिक्षा और जागरूकता की अलख जगा रही हैं। वे अपने विद्यार्थियों के साथ सुदूरवर्ती गांवों में पहुँचकर लोगों को शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता के प्रति प्रेरित करती हैं। उनके नेतृत्व में आयोजित शिविरों और गतिविधियों के माध्यम से युवाओं में समाज के प्रति जिम्मेदारी और सेवा भावना विकसित हो रही है। डॉ. वर्मा का मानना है कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो किसी भी क्षेत्र की दशा और दिशा बदल सकती है। इसी सोच के साथ वे आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करती हैं और उन्हें यह समझाने का प्रयास करती हैं कि शिक्षा के माध्यम से ही बेहतर भविष्य और रोजगार के अवसर प्राप्त किए जा सकते हैं।वे विद्यार्थियों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि उन्हें सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का भी प्रयास करती हैं। गांवों में जाकर वे युवाओं को उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के विभिन्न अवसरों के बारे में जानकारी देती हैं। उनके प्रयासों से कई विद्यार्थी शिक्षा के प्रति जागरूक हुए हैं और अपने जीवन को नई दिशा देने के लिए प्रेरित हुए हैं।लांजी जैसे आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्र में डॉ. कांता वर्मा की पहल शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन की एक सकारात्मक मिसाल बनकर सामने आई है। उनकी निरंतर कोशिशें यह साबित करती हैं कि यदि शिक्षक समर्पित हो,तो वह समाज में बदलाव की एक मजबूत शुरुआत कर सकता है।

 

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