यूरोप का भविष्य
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यूरोप का भविष्य

राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप

बहुपक्षवाद पर आधारित अंतराष्ट्रीय व्यवस्था को अपनाकर खुशहाल समाज का यूरोप का संदेश ट्रम्प की राष्ट्रवादी सनक के आगे धराशायी होने की कगार पर है। यूरोप की सीमाएं बहुत हद तक काल्पनिक है और यूरोपियनों ने शक्ति को पूर्वानुमान से प्रस्तुत करने का जोखिम बार बार उठाया है। अब ट्रम्प ने जब यूरोप की समझ को संकुचित स्वायत्ता के जाल में उलझे होने का एहसास कराया तो दुनिया के सबसे विकसित समझे जाने वाले इस महाद्वीप में रणनीतिक और राजनीतिक स्वायत्ता हासिल करने का विचार उभर कर सामने आ गया। अपनी मजबूरियों और कमजोरियों के जोखिम को स्वीकार करने का  साहस सबसे पहले पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने दिखाया और कहा कि हमें अपनी क्षमता को पहचानकर आगे बढ़ना होगा। आज पचास करोड़ यूरोपीय लोग तीस करोड़ अमेरिकियों से गुहार लगा रहे हैं कि चौदह करोड़ रूसियों से हमारी रक्षा करो। वो इसलिए नहीं कि हम आर्थिक या आबादी के रूप कमजोर हैं। क्योंकि हमें खुद को ग्लोबल पावर होने पर भरोसा नहीं है।

दरअसल यूरोप और अमेरिका के बीच पूंजीवाद का विचार सेतु की तरह काम करता है लेकिन इनके वैचारिक विरोधाभास वैदेशिक नीतियों के तौर पर दिखाई देते है। करीब दो दशक पहले अमेरिकी और यूरोप में जीवन की दृष्टि को लेकर एक सर्वेक्षण सामने आया था। जीवन में सफलता काफी हद तक हमारे नियंत्रण से बाहर की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है,इस कथन का मूल्यांकन करने के लिए पूछे जाने पर,सर्वेक्षण में शामिल 32 फीसदी अमेरिकियों ने इस पर सहमति जताई,जबकि इंग्लैंड में 48 फीसदी, फ्रांस में 54 फीसदी, इटली में 66 फीसदी और जर्मनी में 68 फीसदी ने इस पर सहमति जताई। इससे साफ है कि एक तिहाई से भी कम अमेरिकी अपने जीवन को बाहरी ताकतों द्वारा परिभाषित  माना जबकि यूरोपीय लोग व्यक्तिगत जिम्मेदारी को कम करते हैं और बाहरी ताकतों को बहुत अधिक महत्व देते हैं। दरअसल यह सम्पूर्ण यूरोप का विचार बन गया है जो सामरिक रूप से अमेरिका पर निर्भर होते होते अमेरिकी डॉलर सर्वस्ववाद के जाल में बूरी  तरह फंस चूका है। 

ट्रम्प की एक पक्षीयवाद की नीति अमेरिका की परम्परागत नीति ही है जिसमें अमेरिकी राष्ट्रवाद की सर्वोपरिता विभिन्न रूपों में सामने आती रही है।  ट्रम्प ने इसे खुलकर स्वीकार किया और अपनी वैदेशिक संबंधों में प्राथमिकता से लागू किया तो यूरोप को परेशान नहीं होना चाहिए। दिक्कत यह है कि अमेरिका और यूरोप के मतभेदों को यूरोपियन ने कभी स्वीकार करने का विचार ही नहीं किया और उसके आंखों पर पूंजीवादी विरासत की पट्टी बंधी रही।  अमेरिका पर विश्वास की यह सनक यूरोप के सुरक्षा कवच समझे जाने वाले संगठन नाटो में भी देखी गई। 1949 में अपनी स्थापना से लेकर  लगातार नाटो लगभग पूरी तरह से अमेरिकी सैन्य शक्ति पर निर्भर रहा। नाटो अब अपने 75 साल के इतिहास के पांचवें चरण में है। पहले दो चरण शीत युद्ध के दौरान थे। तीसरा चरण शीत युद्ध के तुरंत बाद का दशक था। चौथा चरण अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर केंद्रित था।  पांचवें चरण में यूक्रेन को बचाने के लिए मजबूत अमेरिकी नेतृत्व की आवश्यकता  महसूस की जा रही थी और लेकिन ट्रम्प ने यूक्रेन के महत्व को ऐतिहासिक रूप से नकार कर नाटो की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए है।  हालांकि नाटो को लेकर ट्रम्प का नजरिया सकारात्मक पहले भी नहीं रहा। अपने पहले कार्यकाल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप,2018 के ब्रुसेल्स शिखर सम्मेलन में इस गठबंधन से हटने के करीब पहुंच गए थे। इसके बाद राष्ट्रपति  बाइडेन के कार्यकाल में नाटो एक नई एकजुटता के साथ उभरा  था जो फिर ट्रम्प के निशाने पर है। ट्रंप के पिछले कार्यकाल में भी चेतावनी दी थी कि अगर यूरोपीय देश अपने रक्षा खर्च को 2 फीसदी तक नहीं बढ़ाते, तो वह नाटो से बाहर हो सकते हैं। अब ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति बनने के साथ, यह तनाव और भी गहरा गया है।

रूस एक अंतरमहाद्वीपीय राष्ट्र है,जो पूर्वी यूरोप और उत्तरी एशिया तक फैला हुआ है। हालांकि इसे सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से यूरोपीय ही माना जाता है। यूरोप का पूंजीवाद रुसी प्रभाव से आशंकित रहा है और उसे रूस की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नजदीकियां भी मंजूर नहीं है। यूरोप ने हजारों  मील की दूरी पर स्थित अमेरिका को अपना सुरक्षा कवच बनाने का जोखिम उठाया था।  जैसे ही ट्रम्प ने साम्यवाद और पूंजीवाद की राजनीतिक दूरियों को आर्थिक संरक्षणवाद की नीति के आगे बौना साबित करने की कोशिश की तो इसकी दहशत से यूरोप कंपकंपाने लगा है। रूस के साथ बेहतर सम्बन्ध  प्रबंधित करने का ट्रम्प  के तरीके को जेंलेंसकी के सार्वजनिक अपमान की कोशिशों के तौर देखा गया है जिससे यूरोप में गुस्सा और चिंताएं है।

पूर्वी यूरोप में स्थित यूक्रेन की भू रणनीतिक स्थिति रूस और यूरोप के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी सीमा उत्तर में बेलारूस,पश्चिम में पोलैंड,स्लोवाकियाऔर हंगरी से लगती है।  जबकि दक्षिण-पश्चिम में रोमानिया और माल्दोवा से लगती है,यूक्रेन के दक्षिण में काला सागर है। 2014 में यूक्रेन युद्ध का मैदान बन गया जब रूस ने क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया और देश के दक्षिण-पूर्व में डोनबास क्षेत्र में अलगाववादियों को हथियार और सहायता देना शुरू कर दिया। रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्ज़ा करना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार था जब किसी यूरोपीय राज्य ने किसी दूसरे देश के क्षेत्र पर कब्ज़ा किया हो। रूस को उत्तरी यूरेशिया में एक महान शक्ति का दर्जा दिलाना हमेशा से पुतिन का लक्ष्य रहा है  और उनके आक्रामक इरादों से यूरोप का बचाव एकजुट यूरोप कर सकता है। इसके साथ ही रूस के विध्वंसक हथियारों से बचाव के लिए यूरोप को अमेरिकी सहायता की जरूरत है। ट्रम्प के पहले संयुक्त राज्य अमेरिका यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की बहाली के लिए प्रतिबद्धता दिखाता रहा और उसने  रूस द्वारा अवैध रूप से कब्जा किए गए अन्य क्षेत्रों पर रूस के दावों को मान्यता नहीं दी। ट्रम्प अमेरिका के पुराने रुख से हट गए है। यह यूक्रेन का नहीं बल्कि पूरे यूरोप का संकट समझा जा रहा है। यूरोप की सुरक्षा में अमेरिकी सेना का अहम योगदान है। यूरोप पर अमेरिकी सुरक्षा गारंटी की स्थिति में बदलाव से ना केवल रूस की आक्रामकता बढ़ेगी,बल्कि यूरोपीय गठबंधन भी कमजोर पड़ सकते हैं।

ग्रीस के प्रधानमंत्री कीरियासकोस मित्सोताकिस इसी बात को इस तरह कहते हैं कि यूरोप को अब जगना होगा और अपना सुरक्षा ढांचा तैयार करना होगा। नए परिदृश्य में यूरोप को अपनी सामूहिक रक्षा प्रणाली को मजबूत करना होगा। यही वजह है कि जर्मनी जैसे यूरोपीय संघ के बड़े देश वायु सेना,एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग और इंटेलिजेंस जैसी उन सामरिक आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं,जिनके लिए अमेरिका पर निर्भरता रही है। यूरोपीय संघ को रक्षा बजट के लिए नए तरीके तलाशने होंगेजैसे कि सामूहिक रूप से उधार लेना या रक्षा परियोजनाओं के लिए विशेष प्रयोजन का इस्तेमाल करना। अगर यूरोपीय देश अपनी रक्षा जिम्मेदारियों को निभाने में गंभीर होंगेतो यह उन्हें ट्रंप के दबाव के सामने मजबूत बना सकता है। यूरोप यूक्रेन को  उन्नत हथियार प्रदान करने और उनके उपयोग पर प्रतिबंधों को शिथिल करने में साहस तो दिखा रहा है,यह सहायता यूक्रेन के लिए अपनी अधिकांश रक्षात्मक रेखाओं को बनाए रखने के लिए पर्याप्त है, लेकिन अपने सभी खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

यूरोपीय नीति-निर्माता अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए नए वित्तीय साधनों की तलाश कर रहे हैं। एक प्रस्ताव यूरोपीय संघ के रक्षा बांड बनाने का है। रक्षा बांड के लिए कई संभावित उपयोग हैं। इनका उपयोग हथियारों की खरीद के लिए यूक्रेन को सहायता प्रदान करने के लिए किया जा सकता है। इनका उपयोग यूरोपीय संघ में रक्षा उपकरणों के उत्पादन को बढ़ावा देने और रक्षा फर्मों के लिए वित्तपोषण लागत को कम करने के लिए किया जा सकता है। वे अगली पीढ़ी के सैन्य उपकरणों के अनुसंधान और विकास को वित्तपोषित करने में भी मदद कर सकते हैंऔर वायु और मिसाइल रक्षा जैसी विशिष्ट सैन्य क्षमताओं की संयुक्त खरीद को वित्तपोषित करने में मदद कर सकते हैं। ट्रम्प की यूक्रेन को लेकर सौदेबाजी की कूटनीति ने यूरोप का सुरक्षा वातावरण अधिक अनिश्चित बना दिया है। अमेरिका और चीन की कड़ीप्रतिस्पर्धा का असर यूरोपीय संघ और चीन के बीच संबंधों पर भी पड़ा है। अमेरिका पर दबाव बढ़ाने के लिए यूरोपीय संघ चीन से व्यापारिक संबंधों को बढ़ा सकता है। चीन के साथ सकारात्मक संबंध को बढ़ावा देना, द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को आगे बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य संकट जैसे वैश्विक मुद्दों पर सहयोग करना ईयू के हित में है।

यूक्रेन के खिलाफ युद्द में रूस के साथ चीन लगातार खड़ा रहा लेकिन चीन की आर्थिक और सामरिक महत्वाकांक्षाएं उसे यूरोप में ज्यादा अवसर देती है। ट्रम्प की नीतियों से पस्त यूरोप चीन में उम्मीदों को ढूंढकर रूस और अमेरिका पर दबाव बढ़ाने की और देख सकता है। अविश्वसनीय और आक्रामक ट्रम्प से मुकाबले के लिए यूरोप की चीन से साझेदारी की  कोई रणनीतिक और आर्थिक पहल विश्व व्यवस्था को बदल कर रख सकती है।

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