नवभारत
माडवी हिड़मा पर छह राज्यों की ओर से इनाम घोषित किया गया था और इसकी कुल राशि एक करोड़ अस्सी लाख रुपये थी। सैकड़ों सुरक्षाबलों की शहादत का जिम्मेदार खूंखार नक्सली हिड़मा आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों के हाथों मारा गया है और यह नक्सल अभियान की सबसे बड़ी सफलता है। इससे नक्सली समस्या के खत्म होने की उम्मीद बढ़ गई है। दरअसल माडवी हिडमा,नक्सली अभियान का बहुत मजबूत नेता था जो पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी का नेतृत्व भी कर रहा था। पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी भारतीय माओवादी आंदोलन की सैन्य रीढ़ है,जिसे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी)ने 2000 में औपचारिक रूप से गठित किया था। इसका उद्देश्य माओवादी विचारधारा के तहत जनयुद्ध चलाना और भारतीय राज्य के विरुद्ध दीर्घकालिक सशस्त्र संघर्ष को संचालित करना था। पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी पारंपरिक सेना की तरह नहीं,बल्कि गुरिल्ला युद्ध पर आधारित एक लचीली,मोबाइल और अत्यधिक विकेंद्रीकृत सैन्य संरचना है। इसे तीन स्तरों,गुरिल्ला स्क्वॉड, प्लाटून, और कंपनी में बांटा गया है,जिनका संचालन अनुभवी माओवादी कमांडर करते हैं।
पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की मुख्य ताकत इसका क्षेत्रीय आधार रहा है। बस्तर,झारखंड,उड़ीसा और महाराष्ट्र के घने जंगल इसकी गतिविधियों के लिए आदर्श युद्धभूमि रही हैं, जहां कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर इसने सुरक्षा बलों को भारी क्षति पहुंचाई। स्थानीय ग्रामीणों से सूचना,समर्थन और छिपाव पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी को अपनी गतिविधियां जारी रखने में मदद देता रहा है। नक्सल आंदोलन ने पिछले दो दशकों में अपनी युद्ध शैली को इस प्रकार विकसित किया है कि कम संसाधनों के बावजूद वे सुरक्षा बलों को भारी क्षति पहुँचा सके। इस रणनीति का खास मास्टर माइंड था हिडमा। पिछले दो दशकों में रेड कॉरिडोर में जो सबसे दुर्दांत नक्सली हमले हुए,उसके केंद्र में हिडमा ही था। खास तौर पर 2010 में हुई ताड़मेटला की घटना,2013 में झीरम घाटी,2017 में बुर्कापाल और 2020 में मिनपा। इन सभी हमलों को नक्सलियों ने बेहद रणनीतिक तरीके से अंजाम दियाथा।ग्रामीणों से मिली सूचनाओं,मुखबिर तंत्र और सामाजिक दबाव के जरिए नक्सली सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते थे। कई बार वे भ्रमित करने वाले नकली इनपुट फैलाते,जिससे सुरक्षा बल जाल में फंस जाएं।गुरिल्ला युद्ध,घातक एंबुश,आईईडी विस्फोट और भौगोलिक बढ़त का संयुक्त उपयोग नक्सलियों के द्वारा किया गया। नक्सली सुरक्षाबलों की मूवमेंट पर ग्रामीणों की मदद से नजर रखते थे। जंगलों और पहाड़ियों में छिपकर वे उचित समय मिलते ही घात लगाकर हमला कर देते थे। और अंत में सुरक्षाबलों के छुपने की जगह में आईईडी विस्फोट करते थे। इस रणनीति से सुरक्षाबलों को गहरा नुकसान होता था। नक्सली हमला करने के बाद घने जंगल,संकरी पगडंडियों और पहाड़ियों से होते हुए भाग जाते थे। हिडमा एक रणनीति के तहत् बड़े हमलों में लगभग तीन सौ कैडरों की टुकड़ी का उपयोग करता था,जिससे सुरक्षा बलों पर दबाव बढ़ जाता था और हमला समाप्त होते ही नक्सली हथियार लूटकर अपनी क्षमता और बढ़ा लेते थे।
2010 में हुआ ताड़मेटला का हमला भारतीय सुरक्षा इतिहास का सबसे भीषण नक्सली हमला माना जाता है,जिसमें सीआरपीएफ की 76 जवानों की पूरी टुकड़ी को नक्सलियों ने बेरहमी से मार डाला था। यह क्षेत्र हिडमा के गांव के पास ही है। इस हमले ने देश को नक्सल समस्या की गंभीरता का एहसास कराया था और सुरक्षा रणनीतियों में बड़े बदलावों की आवश्यकता को उजागर किया था। ताड़मेटला की घटना ने भविष्य के अभियानों को अधिक सतर्क और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया। इसके बाद हिडमा ने झीरम घाटी की घटना को 2013 में अंजाम दिया।बस्तर की संकरी झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्राको निशाना बनाते हुए माओवादियों ने बेहद योजनाबद्ध तरीके से आईईडीविस्फोट और घातक फायरिंग की थी। इस हमले में वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा,नंदकुमार पटेल,उनके पुत्रऔर बाद में घायल अवस्था में विद्या चरण शुक्ल सहित 27 लोगों की मृत्यु हुई थी। यह हमला केवल राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने का प्रयास नहीं थाबल्कि माओवादियों का यह संदेश भी था कि वे बस्तर की राजनीतिक-सामाजिक प्रक्रिया को अपने सशस्त्र प्रभाव के बाहर विकसित नहीं होने देना चाहते। इस घटना के बाद सरकार के द्वारा व्यापक स्तर पर सुरक्षा प्रोटोकॉल,राजनीतिक यात्राओं की निगरानी,इंटेलिजेंस संग्रह और माओवादी क्षेत्रों में सुरक्षा ढांचे की पुनर्रचना पर बल दिया गया।
हिडमा सीआरपीएफ को सबसे बड़ी चुनौती समझता था।अत: उसने एक बार फिर 2017 में एक घातक हमलें को अंजाम दिया।छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में 24 अप्रैल 2017 को हुआ बुर्कापाल हमला नक्सलवाद की सबसे घातक घटनाओं में से एक माना जाता है। इस हमले में सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन के 25 जवान शहीद हो गए थे। नक्सलियों ने सड़क निर्माण कार्य की सुरक्षा में तैनात जवानों पर सुनियोजित घात लगाकर हमला किया,जिसमें पहले रेकी,फिर घेराबंदी और उसके बाद भारी फायरिंग की रणनीति अपनाई गई।इसी प्रकार नक्सलियों ने सुकमा ज़िले के मिनपा क्षेत्र में 21 मार्च 2020 को डीआरजी,एसटीएफ और कोबरा बटालियन के संयुक्त दल पर घात लगाकर भारी हमला किया था जिसमें 17 जवान शहीद हुए थे और कई जवान घायल हुए थे। सुरक्षा बल इलाके में नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना पर निकले थे, लेकिन लौटते समय उन्हें मिनपा के घने जंगलों में सुनियोजित तरीके से एंबुश में फँसा लिया गया। नक्सलियों ने ऊंची जगहों से ताबड़तोड़ फायरिंग की और सुरक्षा बलों के हथियार भी लूट लिए।
हिडमा का दक्षिण बस्तर के जंगलों में मजबूत नेटवर्क था उसे स्थानीय समर्थन हासिल था इसीलिए वह भौगोलिक लाभ उठाकर बड़ी कार्रवाई को अंजाम दे दिया करता था। मिनपा कांड ने सुरक्षा बलों के लिए आधुनिक तकनीक,ड्रोन सर्विलांस, बेहतर संचार व्यवस्था और सड़क नेटवर्क को मजबूत करने की आवश्यकता को और स्पष्ट किया। हिडमा से निपटने के लिए सरकार ने सुरक्षाबलों से मिलकर एक नयी रणनीति पर काम करना प्रारम्भ किया।यह नई रणनीति सुरक्षा,विकास और जनसहभागिता जैसे तीन स्तंभों पर आधारित है। सबसे पहले नक्सली इलाकों को चिन्हित करके सीआरपीएफ के कैम्प बढ़ाएं गए।फिर लगातार गश्त और निगरानी करके नक्सलियों की गतिविधियां सीमित की गई।इसके बाद जवान अब बिना तैयारी के जंगलों में गहराई तक नहीं जाते है और विश्वसनीय सूचना मिलने पर छोटे, तेज़ और लक्ष्य-केंद्रित अभियान चलाते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण रणनीति है सड़क निर्माण और कनेक्टिविटी, जिसने नक्सलियों के सुरक्षित आश्रय क्षेत्रोंको कमजोर किया। पहले बस्तर के बड़े हिस्से नक्सलियों के नियंत्रण में रहते थे क्योंकि सुरक्षा बल वहाँ पहुँच नहीं पाते थे। परंतु सड़कें, मोबाइल टावर, पुल और कैंप खुलने से वही इलाके धीरे-धीरे प्रशासन की पकड़ में आ गए। सुरक्षाबलों के कैंप गहरे जंगलों में स्थापित किए गए,जिससे नक्सलियों का बैक-फुट पर चले गए। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण रणनीति थी विशेष सशस्त्र दल बनाकर उनमें आदिवासी युवाओं की भर्ती बढ़ाई गई।इन्हें क्षेत्र का भूगोल,भाषा और सामाजिक ढांचा अच्छी तरह पता होता है,जिससे ऑपरेशनों में सफलता दर बढ़ी।सरकार ने विकास और सुरक्षा मॉडल अपनाया। स्वास्थ्य,शिक्षाऔर आजीविका योजनाओं ने ग्रामीणों को नक्सलियों से दूर कियाजो पहले मजबूरी या डर के कारण उनका साथ देते थे।
इस प्रकार नई रणनीति ने नक्सलवाद को निर्णायक रूप से कमजोर करने में सफलता दिलाई और अंततः हिडमा मारा गया।हिडमा का मारा जाना सीआरपीएफ की सबसे बड़ी सफलताओं में एक माना जा रहा है,क्योंकि वह नक्सलियों का सबसे चालाक,आक्रामक और खतरनाक कमांडर था। ताड़मेटला, बुर्कापाल और मिनपा जैसे बड़े हमलों का मास्टरमाइंड होने के कारण वह वर्षों से सुरक्षा बलों की सूची में शीर्ष लक्ष्य था। सीआरपीएफ ने लगातार क्षेत्रीय प्रभुत्व,खुफिया सूचना,तकनीकी निगरानी और स्थानीय बलों के समन्वय से उसके नेटवर्क को कमजोर किया। अंततः सटीक सूचना आधारित अभियान में उसकी मौत ने नक्सलियों की कमान, मनोबल और रणनीतिक क्षमता को बड़ी चोट पहुंचाई।सीआरपीएफ के जांबाज़ जवानों की निरंतर बहादुरी,साहस और रणनीतिक क्षमता के कारण नक्सल समस्या अब समाप्ति की कगार पर पहुंच गई है। सीआरपीएफ ने जंगलों में एरिया डोमिनेशन,खुफिया आधारित ऑपरेशन,तकनीकी निगरानी और स्थानीय बलों के साथ समन्वय ने नक्सलियों की ताकत और गतिविधियों को निर्णायक रूप से कमजोर किया है। सीआरपीएफ ने जोखिम भरे इलाकों में कैंप स्थापित कर नक्सलियों के गढ़ को तोड़ा और उनके शीर्ष कमांडरों को खत्म किया। अब नक्सली नेतृत्व लगभग बिखर गया है और यह सरकार और सुरक्षाबलों की बड़ी सफलता है।
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भारत मे आतंकवाद
रेड कॉरिडोर में हिडमा का अंत
- by brahmadeep alune
- November 23, 2025
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