बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का राजनीतिक संकट
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बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का राजनीतिक संकट

 जनसत्ता

 बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा शेख हसीना को फांसी की सजा सुनाने  के बाद भारत के इस पड़ोसी देश में अस्थिरता और हिंसा की चपेट में आने की आशंका गहरा गई है।इसका सीधा असर देश के अल्पसंख्यकों पर होगा,कट्टरपंथी ताकतें मजबूत होगी,वैधानिक व्यवस्थाओं प्रभावित हो सकती है तथा गृहयुद्द जैसे हालात उत्पन्न हो सकते है। देश का लंबे समय तक नेतृत्व करने वाली शेख हसीना के साथ अंतरिम सरकार का बर्ताव बेहद खराब रहा तथा न्यायिक प्रक्रिया का सही पालन नहीं किया गया। इससे अवामी लीग के करोड़ों समर्थकों में गुस्सा है  और इसके दूरगामी परिणाम बांग्लादेश की आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकते है।

बांग्लादेश की राजनीति तीन मुख्य स्तम्भों पर आधारित मानी जाती है।अवामी लीग,बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी एवं उससे जुड़े संगठन। हालांकि इन तीनों की विचारधाराएं,सामाजिक आधार और राजनीतिक व्यवहार एकदूसरे से मेल नहीं खाते है।अवामी लीग की जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन और बंगाली राष्ट्रवाद में गहराई से जुड़ी हैं। यह पार्टी धर्मनिरपेक्षता,उदारवाद और आर्थिक विकास की राजनीति को आगे बढ़ाती है। अवामी लीग का शासन,प्रशासनिक नियंत्रण और विकासवादी मॉडल बांग्लादेश की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्र रहा है। अल्पसंख्यकों और प्रगतिशील वर्ग के लिए यह सबसे विश्वसनीय विकल्प माना जाता है। इसकी शक्ति राज्य संस्थानों,ग्रामीण नेटवर्क और ऐतिहासिक वैधता में निहित है।बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी बांग्लादेशी राष्ट्रवाद और अपेक्षाकृत दक्षिणपंथी सांस्कृतिक पहचान को मूल में रखती है। यह अवामी लीग के संतुलन के रूप में उभरी और शहरी-ग्रामीण रूढ़िवादी वोटरों का समर्थन जुटाती है। वहीं खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी विपक्षी आंदोलनों,चुनावी सुधारों और सत्ता विरोधी भावनाओं को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि नेतृत्व संकट और कट्टरपंथी गुटों से गठबंधन इसकी कमजोरी बनते हैं।जमात-ए-इस्लामी का सामाजिक और राजनीतिक आधार इस्लामवाद पर टिका है।इनका प्रभाव सामाजिक-धार्मिक नेटवर्क,मदरसों और ग्रामीण इलाकों में अधिक दिखाई देता है। अभी तक ये तीन दल बांग्लादेश की राजनीति की दिशा तय करते हैं।

2024 में शेख़ हसीना की सरकार के हटने के बाद बांग्लादेश एक बड़े राजनीतिक संक्रमण काल से गुज़र रहा है। पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय तक अवामी लीग के दृढ़ नियंत्रण के बाद अचानक सत्ता परिवर्तन ने न केवल राजनीतिक संतुलन को बदल दिया हैबल्कि शासन,चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर नए प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार से यह अपेक्षा की गई थी की वह पारदर्शी शासन तंत्र की स्थापना कर देश में लोकतंत्र की मजबूती का प्रयास करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

2024 में व्यापक छात्र आंदोलन के बाद बांग्लादेश एक नए राजनीतिक प्रयोग के दौर में प्रवेश कर चुका है। इसी अस्थिरता और परिवर्तनशील माहौल ने नई राजनीतिक पार्टियों के उदय को तेज़ किया है। इन दलों में सबसे प्रमुख राष्ट्रीय नागरिक पार्टी  है,जिसका गठन आंदोलन का नेतृत्व करने वाले युवा नेता नाहिद इस्लाम ने किया। नाहिद इस्लाम ने पारंपरिक दो-ध्रुवीय राजनीति को चुनौती देते हुए स्वयं को नई राजनीति का प्रतिनिधि घोषित किया है। यह पार्टी शासन में पारदर्शिता,भ्रष्टाचार-नियंत्रण,नागरिक-केन्द्रित नीतियों और एक आधुनिक लोकतांत्रिक संविधान के निर्माण को अपना मूल एजेंडा बताती है। इसके अलावा कई छोटे दल भी उभरे हैं,जो बांग्लादेश के राजनीतिक ढांचे को व्यापक प्रतिस्पर्धा प्रदान करने का दावा कर रहे हैं। अभी चुनाव आयोग के पास पच्चीस-तीस नई पार्टियां पंजीकरण की प्रक्रिया में हैं, जिनमें से कुछ आंदोलन की उपज हैं और कुछ अवसरवादी प्रवृत्ति की। इस व्यापक उभार से यह स्पष्ट है कि देश की राजनीतिक चेतना एक नए मोड़ पर खड़ी है,जहां जनता पारंपरिक नेतृत्व से हटकर नए विकल्प तलाश रही है।

नाहिद इस्लाम बांग्लादेश में जुलाई 2024 में शुरू हुए छात्र आंदोलन के शीर्ष नेताओं में से एक थे। नाहिद इस्लाम के छात्र संगठन ने शेख़ हसीना सरकार की रिजर्वेशन पॉलिसी के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू किया था। इस पॉलिसी के कारण बड़ी संख्या में हिंदू नौकरी में आयें थे। इसका प्रमुख कारण यह भी था की 1971 में पाकिस्तान की सेना ने हिन्दुओं पर सबसे ज्यादा अत्याचार किए थे। बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के सैनिकों और उनके बेटे-बेटियों को सरकारी नौकरियों में  तीस  फ़ीसदी आरक्षण का लाभ हिन्दुओं को भी मिल रहा था। नाहिद इस्लाम ने जातीय नागरिक पार्टी नामक राजनीतिक दल का निर्माण किया है। इस पार्टी  की स्थापना के अवसर पर इस्लाम,हिंदू, बौद्ध और ईसाई धर्म-ग्रंथों के पाठ से शुरू  कर एक बेहतर संदेश देने की कोशिश भी की गई थी। बांग्लादेश की  सत्रह करोड़ आबादी में से  सत्तर  फ़ीसदी  चालीस  वर्ष के कम उम्र के लोग हैं,लिहाजा नाहिद इस्लाम को युवाओं का समर्थन तो मिल सकता है लेकिन अल्पसंख्यक वर्ग के लिए स्थितियां इतनी आसान नहीं है।

बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी,स्वयं को एक इस्लामी पुनर्जागरण आंदोलन की तरह प्रस्तुत करता है और अपने समर्थकों में राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा को मजबूत करता है। यह विचारधारा न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि शहरी शिक्षित वर्ग में भी अलग-अलग रूपों में फैली हुई है। जमात-ए-इस्लामी का लक्ष्य बांग्लादेश में एक इस्लामी समाज और शासन व्यवस्था स्थापित करना है। बांग्लादेश में आगामी फरवरी में आम चुनाव संभावित है। जमात-ए-इस्लामी देश की सर्वोच्च सत्ता को हासिल करने के लिए कृत संकल्पित है और उसकी नजर हिन्दू,बौद्ध,ईसाई जैसे अल्पसंख्यक समूहों पर बांग्लादेश में अल्पसंख्यक करीब  नौ फीसदी है और आम चुनावों में उनकी भूमिका बेहद खास हो जाती है।जमात-ए-इस्लामी के नेता इन दिनों हिन्दू,बौद्ध और ईसाई समुदायों से मुलाकात कर रहे है।अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक आयोजनों में भाग ले रहे है और धर्म गुरुओं को विश्वास में लेने की कोशिश कर रहे है।

देश  के एक और राजनीतिक दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नजर सत्ता पर है और उसके लिए बेहतर अवसर भी है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की राजनीति राष्ट्रीयता,इस्लामी सांस्कृतिक मूल्यों और सत्ता-विरोधी जनभावना पर आधारित मानी जाती है। पार्टी की स्थापना ज़ियाउर रहमान ने की थी,इसलिए इसकी नीतियों में बांग्लादेशी राष्ट्रवाद केंद्रीय विचार रहा है,जिसके तहत यह अवामी लीग की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी धारा का संतुलन प्रस्तुत करती है।  इसका रुख अपेक्षाकृत रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी माना जाता है,जहां इस्लामी पहचान और परंपरागत मूल्यों को राजनीतिक आधार मिलता है। इसने कई बार कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों विशेषकर जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर व्यावहारिक राजनीति अपनाई,जिससे उसकी छवि अल्पसंख्यक-विरोधी और सांप्रदायिक तत्वों को संरक्षण देने वाली बन गई। इसके अलावा नेतृत्व संकट, संगठनात्मक विघटन और भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी पार्टी की वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के रूप में भूमिका को कमजोर किया है। अल्पसंख्यक बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नीतियों से आशंकित रहे है और इसके शासनकाल में कट्टरपंथी तत्वों के अत्याचार भी बढ़ गए थे। ऐसे में अल्पसंख्यक बीएनपी का समर्थन करें,इसकी सम्भावना बहुत कम है।

बांग्लादेश मेंहिंदू, बौद्ध और ईसाई जैसे अल्पसंख्यक समुदाय अवामी लीग पर अपेक्षाकृत अधिक भरोसा करते रहे हैं।इसके पीछे कई ऐतिहासिक व राजनीतिक कारण माने जाते हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि अवामी लीग ने 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में सांप्रदायिक ताकतों का विरोध किया और धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मूल स्तंभ बनाया। इसके विपरीत,जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े दलों पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा,उत्पीड़न और ध्रुवीकरण की राजनीति के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।अवामी लीग के शासनकाल में अक्सर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा,पूजा-स्थलों की रक्षा और साम्प्रदायिक हिंसा पर कार्रवाई का अपेक्षाकृत कठोर रुख देखने को मिला है। पार्टी का वैचारिक रुख धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी होने के कारण अल्पसंख्यक स्वयं को उसके साथ अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। चुनावों के दौरान भी अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर अवामी लीग को स्थिरता एवं सुरक्षा की गारंटीके रूप में देखता है।बांग्लादेश का अल्पसंख्यक वर्ग अवामी लीग को अन्य दलों की तुलना में अपने हितों और अस्तित्व के लिए अधिक भरोसेमंद मानता है।अब शेख हसीना का वापस बांग्लादेश लौटना और चुनावों में भाग लेना मुश्किल है।उनकी पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।अवामी लीग के नेताओं को युनुस की अंतरिम सरकार निशाना बन रही है वहीं कट्टरपंथी तत्व भी नहीं चाहते है देश में अवामी लीग का शासन फिर से लौटे। अवामी लीग के बाद  अल्पसंख्यक वर्ग के लिए ज्यादा विकल्प नहीं है। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश एक राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। लंबे समय तक स्थिर शासन के बाद अचानक हुए इस परिवर्तन ने देश के अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों में अनिश्चितता और असुरक्षा की भावना बढ़ाई है। हसीना सरकार पर आरोप और आलोचनाएँ भले रही हों, लेकिन यह तथ्य स्पष्ट है कि उनके शासन में अल्पसंख्यक अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करते थे। चरमपंथी ताकतों पर नियंत्रण और कट्टरपंथी संगठनों को सीमित रखने की नीति ने सामाजिक संतुलन बनाए रखा था।

अब बांग्लादेश का राजनीतिक परिदृश्य विभाजित है और कोई ऐसा सशक्त मुख्यधारा विकल्प दिखाई नहीं देता जो स्पष्ट रूप से अल्पसंख्यक संरक्षण को प्राथमिकता देता हो। विपक्ष की कई पार्टियों पर कट्टरपंथी संगठनों के प्रभाव का आरोप लगता रहा है,जिससे अल्पसंख्यक समुदाय का भरोसा कमजोर हुआ है। अवामी लीग पर प्रतिबन्ध के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के सामने विकल्प बेहद सीमित दिखते हैं। देश के अल्पसंख्यक धार्मिक कट्टरता पर रोक  चाहते है परंतु मौजूदा राजनीतिक  ढांचे में ऐसा स्पष्ट विकल्प उभर नहीं रहा।शेख हसीना के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित एवं भरोसेमंद नेतृत्व का अभाव एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

पाकिस्तान के धर्म गुरुओं की शरिया और उम्मत के दावें तथा मोहम्मद यूनुस का शाहबाज़ शरीफ और आईएसआई पर विश्वास से बांग्लादेश के समाज में विभाजन बढ़ रहा है।अंतरिम व्यवस्था की सीमित अधिकारिता और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर अनिश्चितता ने कानून-व्यवस्था को भी कमजोर किया है। इसके परिणामस्वरूप कई कट्टरपंथी समूह फिर से सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं। अल्पसंख्यकों पर हमलों,धार्मिक तनावों की वृद्धि और उग्रवादी नारों की खुलेआम अभिव्यक्ति  से यह लगता है की चरमपंथी ताकतें खुद को ज्यादा सुरक्षित और प्रभावशाली महसूस कर रही।जाहिर है अल्पसंख्यकों के लिए यह स्थिति असामान्य है और उनका राजनीतिक भविष्य संकट में है।

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