सत्तामेल
भारत में क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो ने कहा था की पाकिस्तान या अन्य देशों के साथ अमेरिका के संबंध भारत के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी की कीमत पर नहीं होंगे। क्या वास्तव में अमेरिका के लिए भारत बहुत महत्वपूर्ण है और भारत को भी अमेरिका की जरूरत है। पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एशिया-प्रशांत शब्द अधिक प्रचलित था,जिसमें पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया जाता था। लेकिन चीन के बढ़ते प्रभाव,हिंद महासागर के बढ़ते महत्व और भारत की उभरती भूमिका के कारण इंडो-पैसिफिक शब्द का प्रयोग बढ़ा। इस अवधारणा का मूल विचार यह है कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब अलग-अलग रणनीतिक क्षेत्र नहीं रहे हैं। व्यापार,ऊर्जा आपूर्ति,समुद्री सुरक्षा और सैन्य गतिविधियां दोनों को आपस में जोड़ती है।
इंडो-पैसिफिक वैश्विक शक्ति-संतुलन का केंद्र है। आने वाले दशकों में विश्व राजनीति,व्यापार,समुद्री सुरक्षा और तकनीकी प्रतिस्पर्धा का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में तय होगा। इसी कारण भारत,अमेरिका,चीन,जापान और अन्य प्रमुख शक्तियों की रणनीतियों में इंडो-पैसिफिक को विशेष महत्व प्राप्त है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई जिसमें समुद्री मार्ग खुले रहे,व्यापार अपेक्षाकृत स्वतंत्र रहे और सुरक्षा व्यवस्थाओं में अमेरिकी प्रभाव बना रहे। यदि इंडो-पैसिफिक में उसका प्रभाव कम होता है तो वैश्विक स्तर पर उसकी भूमिका भी कमजोर पड़ सकती है। 21वीं सदी की प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य शक्ति की नहीं है। सेमीकंडक्टर,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,दुर्लभ खनिज,डिजिटल नेटवर्क और आपूर्ति श्रृंखलाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इंडो-पैसिफिक इन सभी क्षेत्रों का प्रमुख केंद्र है। इसलिए अमेरिका इस क्षेत्र में मजबूत रहना चाहता है और यह उसकी दीर्घकालीन रणनीतिक का हिस्सा है। यहीं पर भारत का महत्व बढ़ जाता है। अमेरिका भारत एक ऐसी प्रमुख शक्ति के रूप में देखता है जो हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने में योगदान दे सकती है। इसी कारण क्वाड,रक्षा सहयोग,समुद्री सुरक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है। अमेरिका के लिए इंडो-पैसिफिक में शक्ति-संतुलन बनाएं रखना केवल चीन को रोकने के साथ ही यह वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा,तकनीकी प्रतिस्पर्धा,सहयोगी देशों की सुरक्षा और अमेरिकी वैश्विक प्रभाव से जुड़ा हुआ मुद्दा है। इसलिए चाहे व्हाइट हाउस में ट्रम्प या कोई भी प्रशासन हो,इंडो-पैसिफिक क्षेत्र आने वाले वर्षों में अमेरिकी विदेश नीति की प्रमुख प्राथमिकताओं में बना रहने की संभावना है।
चीन के बढ़ते आर्थिक,सैन्य और भू-राजनीतिक प्रभाव ने एशिया में शक्ति-संतुलन की नई चुनौती पैदा की है। भारत और अमेरिका दोनों इस परिवर्तन को अपनी-अपनी दृष्टि से देखते है,लेकिन दोनों के हित कई बिंदुओं पर मिलते हैं। भारत अपनी सीमाओं,समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव की रक्षा करना चाहता है, जबकि अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से आशंकित है। इसलिए भारत के साथ अमेरिका का समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ रहा है। भारत को चीन के दबाव का संतुलन बनाने में अमेरिका उपयोगी लगता है,वहीं अमेरिका भारत को एशिया में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखता है।
अमेरिका और भारत के संबंधों का वास्तविक आधार साझा हितों पर टिका है। लोकतंत्र,आर्थिक अवसर, तकनीकी सहयोग, चीन की चुनौती और वैश्विक शक्ति संतुलन ने दोनों देशों के संबंधों को गहरा किया है। यही कारण है कि समय-समय पर उत्पन्न होने वाले राजनीतिक और कूटनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत-अमेरिका संबंध लगातार मजबूत होते दिखाई देते है। ट्रम्प की विदेश नीति का मूल आधार वैचारिक प्रतिबद्धताओं की अपेक्षा अमेरिकी हितों की पूर्ति रहा है। इसी कारण वे एक ओर भारत को महत्वपूर्ण साझेदार बताते है,तो दूसरी ओर चीन के साथ समझौते की संभावनाएं भी तलाशते है और पाकिस्तान के साथ संपर्क बनाए रखने से भी परहेज नहीं करते। इसे अमेरिका के व्यापक रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। अमेरिका और चीन के बीच तकनीक,समुद्री सुरक्षा,वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,सेमीकंडक्टर और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा है। ऐसे परिदृश्य में भारत दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या, तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था,विशाल उपभोक्ता बाजार और महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति के कारण अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। पिछले दो दशकों में अमेरिकी नेताओं ने भारत को रणनीतिक साझेदार, विश्वसनीय मित्र,इंडो-पैसिफिक का स्तंभ और 21वीं सदी का महत्वपूर्ण भागीदार बताया है। यह अमेरिका की उस वास्तविकता की स्वीकारोक्ति है कि एशिया में दीर्घकालिक शक्ति संतुलन की किसी भी रणनीति में भारत की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध रखता है,लेकिन साथ ही रूस,पश्चिम एशिया,दक्षिण-पूर्व एशिया और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी अपने संबंधों को संतुलित बनाएं रखता है। अमेरिका ने भी धीरे-धीरे इस वास्तविकता को स्वीकार किया है कि भारत किसी सैन्य गठबंधन का सदस्य बनने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति को प्राथमिकता देगा।
ट्रम्प यदि पाकिस्तान के साथ संवाद बढ़ाते है या चीन के साथ किसी मुद्दे पर समझौते की कोशिश करते है,तो इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत अमेरिका के लिए अप्रासंगिक हो गया है। अमेरिकी कूटनीति का स्वभाव ही बहुस्तरीय है। वाशिंगटन एक ही समय में विभिन्न देशों के साथ अलग-अलग उद्देश्यों के लिए संबंध बनाएं रखता है और भारत को अमेरिका की बहुस्तरीय कूटनीति की विशेषता को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। अमेरिका के लिए पाकिस्तान उसके लिए क्षेत्रीय सुरक्षा और सामरिक संपर्क का माध्यम हो सकता है,चीन आर्थिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है,लेकिन भारत एक ऐसी उभरती शक्ति है जिसके साथ अमेरिका का संबंध दीर्घकालिक और बहुस्तरीय हितों पर आधारित है।
क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की भारत में हुई बैठक ने केवल एक कूटनीतिक आयोजन का काम नहीं किया,बल्कि इसने एशिया की बदलती भू-राजनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश भी दिया है। चीन और पाकिस्तान के लिए यह संकेत स्पष्ट है कि अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है। पिछले कुछ महीनों में ट्रम्प प्रशासन की नीतियों, व्यापारिक मतभेदों तथा पाकिस्तान के साथ बढ़ते अमेरिकी संपर्कों को लेकर भारत में अनेक आशंकाएँ व्यक्त की जा रही थी। ऐसे समय में क्वाड मंच पर भारत की केंद्रीय भूमिका ने उन आशंकाओं को काफी हद तक कम किया है। बहरहाल ट्रम्प की नीतियों में विरोधाभास के बावजूद अमेरिका हिन्द प्रशांत की रणनीतिक वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं कर सकता। यह वह बिंदु है जिसने भारत और अमेरिका को एक-दूसरे का महत्वपूर्ण साझेदार बना दिया है। यही कारण है कि मतभेदों और आशंकाओं के बावजूद भारत का महत्व अमेरिका की वैश्विक रणनीति में बना हुआ है।








Leave feedback about this