उत्तर कोरिया,चीन और रूस ने बदल दिया ईरान का सैन्य भूगोल
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उत्तर कोरिया,चीन और रूस ने बदल दिया ईरान का सैन्य भूगोल

नवभारत
जॉर्डन में अल-अज़राक एयरबेस, प्रिंस हसन एयरबेस, किंग फैसल एयरबेस और अल-सफावी बेस जैसे अमेरिकी और अन्य रणनीतिक सैन्य ठिकानों पर ईरान के हमलों ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान अब केवल मिसाइलों या ड्रोन के सीमित उपयोग तक ही नहीं रुका है, बल्कि वह अपने सैन्य अभियानों में बहुस्तरीय और समन्वित रणनीतियों का प्रयोग कर रहा है। यह घटनाक्रम आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति का एक महत्वपूर्ण संकेत है। आज किसी संघर्ष की सफलता केवल हथियारों की संख्या या उनकी मारक क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी निर्धारित होती है कि विभिन्न सैन्य साधनों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर क्षमताओं, ड्रोन, मिसाइलों और खुफिया तंत्र का कितनी प्रभावी ढंग से समन्वय किया जाता है। यही कारण है कि हाइब्रिड वॉरफेयर और मल्टी-लेयर्ड अटैक जैसी अवधारणाएं आधुनिक युद्ध की केंद्रीय रणनीति बनती जा रही हैं।
दरअसल पश्चिम एशिया में हाल के वर्षों में यदि किसी देश की सैन्य क्षमता ने सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया है, तो वह ईरान है। कभी हथियारों और सैन्य तकनीक के लिए बाहरी देशों पर निर्भर रहने वाला यह देश आज लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों, अत्याधुनिक ड्रोन, आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता के कारण क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली सैन्य शक्तियों में गिना जाता है। जॉर्डन में हमलों में जिस रणनीति का प्रदर्शन हुआ, उसे सैन्य विशेषज्ञ मल्टी-लेयर्ड अटैक कहते हैं। इस रणनीति के तहत सबसे पहले बड़ी संख्या में आत्मघाती ड्रोन और कम लागत वाले हवाई प्लेटफॉर्म छोड़े जाते हैं। इनका उद्देश्य विरोधी देश के रडार और वायु रक्षा प्रणाली को व्यस्त रखना होता है। इसके बाद लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से कमांड सेंटर, एयरबेस, विमान हैंगर और अन्य रणनीतिक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाता है। मिसाइल और ड्रोन का यह संयुक्त उपयोग पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, क्योंकि उन्हें एक साथ अनेक दिशाओं से आने वाले अलग-अलग प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे लगभग तीन दशकों का सैन्य, तकनीकी और औद्योगिक विकास छिपा है। इस विकास में ईरान के स्वदेशी अनुसंधान की महत्वपूर्ण भूमिका रही, लेकिन उतना ही बड़ा योगदान चीन, उत्तर कोरिया और रूस के साथ विकसित हुए सहयोग का भी रहा। इन तीनों देशों ने ईरान को सीधे अत्याधुनिक हथियार देने के बजाय ऐसी तकनीक, औद्योगिक क्षमता, प्रशिक्षण और रक्षा अवसंरचना उपलब्ध कराई, जिसने उसे आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति में बदल दिया।
चीन ने ईरान को आधुनिक रक्षा उद्योग विकसित करने में सबसे व्यापक तकनीकी सहयोग प्रदान किया। पश्चिमी देशों के विभिन्न आकलनों के अनुसार, चीनी मूल के सेंसर, माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, कंपोजिट सामग्री, मशीन टूल्स, नेविगेशन उपकरण तथा मिसाइल ईंधन से संबंधित औद्योगिक सामग्री वर्षों से ईरान की रक्षा उत्पादन प्रणाली तक पहुँचती रही है। इन तकनीकों ने ईरान को केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें स्वयं विकसित और बड़े पैमाने पर निर्मित करने की क्षमता प्रदान की। ईरान के शाहेद ड्रोन कार्यक्रम के विकास में भी चीनी औद्योगिक अनुभव और वाणिज्यिक इलेक्ट्रॉनिक्स की भूमिका की चर्चा अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषणों में होती रही है। आधुनिक ड्रोन युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, संचार प्रणाली और नेविगेशन तकनीक उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी स्वयं ड्रोन की संरचना। यही कारण है कि आज ईरान कम लागत वाले लेकिन प्रभावी ड्रोन विकसित करने में सफल रहा है, जिनका उपयोग रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक देखा गया है।
यदि चीन ने ईरान के रक्षा उद्योग को तकनीकी आधार दिया, तो उत्तर कोरिया ने उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम की बुनियाद रखी। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया ने ईरान को स्कड-बी और स्कड-सी जैसी मिसाइलें उपलब्ध कराईं। बाद में इन्हीं तकनीकों के आधार पर ईरान ने शाहाब-1, शाहाब-2 और शाहाब-3 जैसी मिसाइलों का विकास किया। उत्तर कोरिया की नोडोंग मिसाइल तकनीक ने ईरान की मध्यम दूरी की मिसाइल क्षमता को नई दिशा दी। इसके अतिरिक्त मिसाइल इंजन, प्रक्षेपण प्रणाली, मोबाइल लॉन्चर, उत्पादन तकनीक, परीक्षण प्रक्रियाएँ और इंजीनियरिंग प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में भी उत्तर कोरिया का सहयोग महत्वपूर्ण माना जाता है। समय के साथ ईरान ने इन तकनीकों को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने अनुसंधान और उत्पादन क्षमता के अनुरूप विकसित भी किया। परिणामस्वरूप आज उसकी कई मिसाइलें मूल उत्तर कोरियाई डिजाइनों से काफी आगे निकल चुकी है।

रूस का योगदान मुख्य रूप से वायु रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, अंतरिक्ष तकनीक और सामरिक सहयोग के क्षेत्र में दिखाई देता है। रूस ने ईरान को S-300 जैसी उन्नत वायु रक्षा प्रणाली, रडार तकनीक, हेलीकॉप्टर, उपग्रह सहयोग और आधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क विकसित करने में सहायता दी। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच साइबर सुरक्षा, उपग्रह निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और खुफिया सहयोग भी बढ़ा है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और ईरान के रक्षा संबंधों में उल्लेखनीय तेजी आई। ईरान ने रूस को बड़ी संख्या में शाहेद’ आत्मघाती ड्रोन उपलब्ध कराए, जबकि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में रूस से ईरान को उन्नत रडार, वायु रक्षा तकनीक, उपग्रह सहयोग और सुखोई-35 जैसे लड़ाकू विमानों से संबंधित सहयोग की चर्चा होती रही है।
ईरान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उसे चीन, रूस और उत्तर कोरिया से सहयोग मिला, बल्कि यह है कि उसने उस सहयोग को अपने स्वदेशी अनुसंधान और रक्षा उद्योग में रूपांतरित कर दिया। आज खेबर शिकन, हज कासिम, सेज्जील, फतह-110 और खोर्रमशहर जैसी मिसाइलें तथा ‘शाहेद’ श्रृंखला के ड्रोन इसी आत्मनिर्भरता का परिणाम हैं। इन हथियारों में ठोस ईंधन, बेहतर मार्गदर्शन प्रणाली, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और अधिक सटीक लक्ष्यभेदन जैसी क्षमताएँ शामिल की गई हैं। ईरान अब केवल अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला देश नहीं रहा। उसने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में ऐसी क्षमता विकसित कर ली है कि वह अपने सहयोगी देशों और गैर-राज्य समूहों तक भी ड्रोन और मिसाइल तकनीक पहुँचाने की स्थिति में आ गया है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया के लगभग हर बड़े संघर्ष में ईरानी हथियारों या उनकी तकनीक की चर्चा होती है। ईरान की सैन्य शक्ति ने पश्चिम एशिया की सामरिक राजनीति को नया स्वरूप दिया है। अब अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों को केवल पारंपरिक युद्ध की नहीं, बल्कि मिसाइलों, ड्रोन, साइबर हमलों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के संयुक्त खतरे का सामना करना पड़ रहा है। भविष्य के युद्धों में सफलता केवल आधुनिक लड़ाकू विमानों या टैंकों से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से भी होगी कि कोई देश मिसाइल, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उपग्रह नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का कितना प्रभावी समन्वय कर सकता है। ईरान ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। उत्तर कोरिया ने ईरान को मिसाइल कार्यक्रम की शुरुआती तकनीकी नींव प्रदान की, चीन ने उसके रक्षा उद्योग को आधुनिक तकनीक और औद्योगिक आधार दिया, जबकि रूस ने वायु रक्षा, अंतरिक्ष और सामरिक सहयोग के माध्यम से उसकी सैन्य क्षमता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। लेकिन इन तीनों देशों से प्राप्त सहयोग को स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और बड़े पैमाने पर उत्पादन में बदल देना ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता रही है।
ईरान की कहानी केवल मिसाइलों की कहानी नहीं है। यह उस देश की कहानी है जिसने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, आर्थिक दबाव और तकनीकी चुनौतियों के बीच अपने रक्षा उद्योग को खड़ा किया। उत्तर कोरिया ने उसे मिसाइल कार्यक्रम की शुरुआती नींव दी, चीन ने तकनीकी और औद्योगिक आधार मजबूत किया और रूस ने वायु रक्षा तथा सामरिक सहयोग से उसकी क्षमता का विस्तार किया। लेकिन इन तीनों देशों से प्राप्त सहयोग को स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और बड़े पैमाने पर उत्पादन में बदल देना ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता रही। यही कारण है कि आज ईरान केवल पश्चिम एशिया की एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि आधुनिक मिसाइल और ड्रोन युद्ध की बदलती वैश्विक रणनीति का एक महत्वपूर्ण भाग  बन चुका है। आने वाले वर्षों में उसकी सैन्य क्षमता केवल मध्य-पूर्व ही नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को भी प्रभावित करती रहेगी।

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