प्रजातंत्र
इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में दुनिया के कई ताक़तवर देशों को चुनौती देने वाले उस्मानिया सल्तनत का साम्राज्य का दायरा करीब पचास लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया था। उस्मानिया सल्तनत का विस्तार मिस्र,ग्रीस,हंगरी,जॉर्डन,लेबनान,इसराइल,फलस्तीन,रोमानिया,सीरिया,सऊदी अरब और उत्तरी अफ्रीका तक था।अल्बानिया,साइप्रस,इराक़,सर्बिया,क़तर और यमन भी उस्मानिया सल्तनत का हिस्सा थे। फ्रांसीसी राजनयिक फ्रंकोईस जॉर जिस पिकाट और ब्रिटिश सर मार्क साइक्स ने गुप्त कूटनीति के कौशल से और रूस की सहमति से लगभग छह सौ वर्षों तक तक राज करना वाली उस्मानिया सल्तनतको खत्म कर दिया था।
साइक्स-पिकाट समझौता को एशिया माइनर समझौते के रूप में जाना जाता है। यह एक गुप्त समझौता था जिसमें ओटोमन साम्राज्य के विघटन के बाद मध्य पूर्व के क्षेत्रों को ब्रिटेन और फ्रांस के बीच विभाजित करने की योजना बनाई गई। इस समझौते के अनुसार,फ्रांस को सीरिया और लेबनान का नियंत्रण मिला,जबकि ब्रिटेन को इराक और फिलिस्तीन का नियंत्रण मिला। इस समझौते को मध्य पूर्व में बाद के संघर्षों और सीमाओं के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। इसके पहले 1915 में साइक्स की सिफारिश पर अरब ब्यूरो की स्थापना की गई। यह इकाई मिस्र में ब्रिटिश खुफिया ब्यूरो के रूप में काम करती थी और इसे निकट पूर्व में राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करने का काम सौंपा गया था। ऐसा माना जाता है कि इसने ओटोमन-प्रशासित क्षेत्रों के पुराने नामों को पुनर्जीवित किया, जैसे फिलिस्तीन,सीरियाऔर इराक। योमकिप्पुर युद्ध,अरब के इतिहास का एक भीषणतम संघर्ष था,इसकी शुरुआत मिस्र और सीरिया ने 6 अक्टूबर, 1973 को यहूदियों के पवित्र दिन योमकिप्पुर पर की थी। यह भी दिलचस्प है की रमजान भी इसी दौरान था। यह युद्द पूरे बीस दिन तक चला। संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दोनों अपने-अपने सहयोगियों की रक्षा में अप्रत्यक्ष टकराव में शामिल हो गए थे। लेकिन एक अमेरिकी नेता ने गुप्त कूटनीति से सभी पक्षों को शांत रहने पर तैयार कर लिया। बाद में इजराइल और मिस्र ने एक स्थायी शांति समझौते पर हस्ताक्षर करके इतिहास रच दिया,जिसके कारण इजराइल सिनाई प्रायद्वीप से पूरी तरह से वापस चला गया और दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य हो गए। यह सम्बन्ध अब भी सामान्य है।
दरअसल साइक्स-पिकाट समझौता और योम किप्पुर पर समझौता इसीलिए सफल हो पाया क्योंकि इसे बेहद गोपनीय तरीके से और गंभीरतापूर्वक अंजाम दिया गया था। गुप्त कूटनीति एक प्रकार की कूटनीतिक कला है जिसमें दो राष्ट्रों के बीच विवादों या संघर्ष रोकने के लिए बातचीत बंद दरवाजों के पीछे की जाती है। इस तरह की कूटनीति को शांत कूटनीति भी कहा जाता है। शीत युद्द के दौरान कई बार अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव बढ़ा,जिसे गुप्त कूटनीति के जरिए सुलझाने में बड़ी मदद मिली। गुप्त कूटनीति ने ही शीतयुद्ध को परमाणु युद्ध में बदलने से रोका।1960-70 के दशक में अमेरिका के एक विदेश मंत्री थे हेनरी किसिंजर,उन्होंने कहा था कि कूटनीति की कला यह जानना है कि कब चुप रहना है और कब बोलना हैऔर किससे बोलना है। कूटनीति समस्याओं को सुलझाने और समझौते करने के लिए दूसरे देशों से बात करने की कला में गुप्त कूटनीति का बड़ा योगदान माना जाता है। योम किप्पुर युद्ध को रुकवाने में किसिंजर की ही भूमिका थी।
किसिंजर ने शीत युद्ध के कुछ सबसे महत्वपूर्ण वर्षों के दौरान अमेरिकी विदेश नीति को आकार दिया और मध्यस्थता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई लोग चीन के पश्चिम के साथ जुड़ने में उनका योगदान हमेशा याद करते है। 1971 में,उन्होंने बीजिंग की एक गुप्त यात्रा की।उन्होंने पाकिस्तान में एक बैठक के दौरान बीमारी का बहाना बनाया और अभूतपूर्व वार्ता के लिए बीजिंग के लिए गुप्त उड़ान भरी,जिसके कारण अगले वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की अभूतपूर्व यात्रा हुई। किसिंजर को आज भी चीन में सकारात्मक रूप से एक ऐसे दूत के रूप में याद किया जाता है जो शीत युद्ध के चरम पर वैचारिक मतभेदों को नजरअंदाज करने और एक ऐसे मेल-मिलाप को आगे बढ़ाने के लिए तैयार था। जिसने समय के साथ साम्यवादी शासित चीन को दुनिया के साथ जोड़ दिया। वह उन बहुत कम विदेशी नेताओं में से एक थे जिन्होंने माओ से लेकर शी जिनपिंग तक कम्युनिस्ट नेताओं की पांच पीढ़ियों से मुलाकात की थी।
गुप्त कूटनीति का महत्व अंतरराष्ट्रीय संबंधों, विभिन्न देशों के बीच संवाद और नीति-निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण रहा है।जब वार्ताएं गोपनीय रहती हैंतो सीमा विवाद,शांति संधि या रक्षा समझौते जैसे मुद्दों परदोनों पक्ष खुलकर अपनी चिंताएं और शर्तें रख सकते हैं। इससे समाधान निकालना आसान होता है। इसमें मध्यस्थता निभाने वाले देश उच्च मानकों का पालन करते हुए गोपनीयता का सम्मान करते है और इसे प्रतिबद्धता से बनाएं रखते है। ईरान इजराइल संघर्ष के दौरान ईरान के विदेश मंत्री की रूस के राष्ट्रपति से क्रेमलिनमें मुलाक़ात हुई तो इसका रूस के सरकारी टीवी चैनल पर सीधा प्रसारण किया गया। इसके पहले ट्रम्प और जेंलेस्की की मुलाकात और बातचीत मीडिया के सामने की गई।रूस यूक्रेन संघर्ष तीन वर्षों से लगातार जारी है,इसमें हजारों सैनिक मारे गए है और लाखों लोग बेघरबार हो गए है।वहीं ईरान इजराइल संघर्ष दुनिया के लिए किसी बुरे सपने जैसा था।
गुप्त कूटनीति शक्तियों के बीच क्षेत्रीय हितों को साधने का उपकरण रही है लेकिन पुतिन और ट्रम्प जैसे राष्ट्राध्यक्ष अपने देश की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करने के लिए युद्द और हिंसक संघर्ष की भयावहता के खतरों को बढ़ा रहे है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे बड़ा यूरोपीय आक्रमण शुरू करने वाले पुतिन से बातचीत को ट्रम्प दुनिया के सामने लगातार ला रहे है वहीं पुतिन का नजरिया भी ईरान इजराइल पर स्पष्ट नहीं रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्द विराम को लेकर ट्रम्प के दावे भ्रामक और आंतरिक राजनीति से प्रेरित नजर आएं। गुप्त कूटनीति संघर्ष के संभावित समाधानों पर बातचीत करने के लिए आदर्श स्थिति निर्मित करती है। इसके सकारात्मक और दीर्घकालीन लाभ दुनिया को मिले है तथा कई युद्दों और संघर्षों को रोकने में इससे बड़ी मदद मिली है।पुतिन और ट्रम्प को यह समझना होगा की यदि दुनिया में संघर्षों को रोकना है तो बंद दरवाजों के पीछे दोनों पक्षों से बातचीत करना होगी तथा इसकी गंभीरता को बनाएं रखते हुए,गोपनीयता का भी सम्मान करना होगा। वहीं ट्रम्प और पुतिन प्रचार की कूटनीति को लगातार आजमा रहे है। अन्तर्राष्ट्रीय विवादों में प्रचार कूटनीति से शत्रुता या नफरत कभी खत्म नहीं हो सकती और न ही इससे अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के दीर्घकालीन समाधान निकल सकते है।
ईरान इजराइल संघर्ष फ़िलहाल थम गया है लेकिन तनाव की तीव्रता में कोई कमी नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच गहरा अविश्वास बना हुआ है,वहीं ट्रम्प के तमाम दावों के बाद भी रूस यूक्रेन संघर्ष बदस्तूर जारी है। जाहिर है अन्तर्राष्ट्रीय विवादों की संवेदनशीलता को समझने वाले वैश्विक नेता पूरे परिदृश्य से गायब है और जो प्रभाव में है,उनकी प्रचार की भूख संघर्षों को रोकने में बुरी तरह असफल हो रही है।








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