राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दो धारी कूटनीति एक अत्यंत व्यावहारिक और प्रभावी उपकरण माना जाता है। विशेषकर तब जब कोई देश अपने हितों को बहुपक्षीय रूप से सुरक्षित करना चाहता है। यह नीति न केवल रणनीतिक लाभ दे सकती है,बल्कि विश्व मंच पर एक देश की स्थिति को भी मजबूत भी कर सकती है। भारत ने आर्थिक और सुरक्षा संयोजन में सामंजस्य को अपनाकर पिछले कुछ वर्षों में बहुपक्षीय सम्बन्धों को ज्यादा प्राथमिकता दी है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी से मची अराजकता पर कड़ी प्रतिक्रिया से परहेज किया,वहीं यूक्रेन पर रूस के हमलें से उपजी परिस्थितियों में भारतीयों को सुरक्षित निकालने की कूटनीति तक सीमित कर दिया। इस वर्ष की शुरुआत में ट्रम्प ने अवैध प्रवासियों को बेड़ियों से जकड़कर अपने अपने देश भेजा तो कोलंबिया जैसे छोटे से देश ने अपने नागरिकों को वापस भेजने के तरीके पर खुलकर विरोध किया। वहीं,भारत ने इसे वर्षों से चली आ रही प्रक्रिया बता कर स्वीकार कर लिया।
भारत पिछले डेढ़-दो दशकों से अमेरिका के साथ अपने संबंधों को आगे ले जाने पर ज़ोर देता देखा गया है जबकि अमेरिका की नीतियां अव्यवहारिक देखी गई है। ट्रंप से पहले बाइडन के दौर में दोनों देशों के बीच उतार-चढ़ाव और मतभेद देखे गए,वहीं ट्रम्प खुले तौर पर भारत को चुनौती देते हुए दिखाई दे रहे है। कश्मीर को लेकर भारत पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता से लेकर भारत में उद्योग न लगाने की उनकी सार्वजनिक बयानबाज़ी ने भारत को विचलित ही किया है। डेढ़ दशक में भारत ने बड़ी संख्या में अमेरिका से सैन्य उपकरणों को ख़रीदने की शुरुआत की है। भारत अमेरिका का एक औपचारिक सैन्य सहयोगी नहीं था लेकिन इसके बावजूद उसे अमेरिका की किसी भी इंडो-पैसिफिक रणनीति का आधार बनाया गया और भारत ने इसे स्वीकार भी किया। क्वाड चीन की चुनौती का सीधा मुकाबला करने की एक बड़ी योजना की ओर ले जाया गया। अमेरिकी साझेदारी को भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने और चीन के क्षेत्रीय प्रभाव का संतुलन बनाने में सहायक समझा। यह विश्वास किया जाता है कि क्वाड भारत के लिए एक कूटनीतिक और रणनीतिक मंच है, जो उसे हिंद-प्रशांत में अपनी स्थिति मजबूत करने,चीन को संतुलित करने और वैश्विक शक्ति संरचना में सक्रिय भूमिका निभाने में मदद करता है।
भारत और अमेरिकी सम्बन्धों में गहरे अविश्वास के बाद भी चीन को लेकर दोनों देशों में आपसी साझेदारी की जरूरत को महसूस किया गया है। डी आइजनहावर भारत के दौरे पर आने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थे। वह दिसंबर 1959 में दोनों देशों के बीच आश्चर्यजनक संबंधों को मजबूत करने के लिए भारत का दौरा करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने साफ कहा था की अमेरिका भारत को चीनी कम्युनिस्ट आक्रामकता का सामना करने में मदद करेगा। उनकी कूटनीति में यह स्पष्ट था की भारत अमेरिकी मित्रता को उस बिंदु तक स्पष्ट रूप से मजबूत करना था जहां कोई गारंटी आवश्यक नहीं थी। चीन से भारत के 1962 के युद्द में अमेरिका के बिना शर्त सहयोग के बाद भी भारत ने अमेरिका पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं किया। उस दौरान वियतनाम में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की भारत में मुखर आलोचना की। भारत ने वियतनाम में हो रही हिंसा और अमेरिका के सैन्य हस्तक्षेप की आलोचना करते हुए वहां शांति और वार्ता का समर्थन किया। भारत ने यह माना कि यह युद्ध साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ वियतनाम की आत्मनिर्भरता की लड़ाई है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका के आक्रामक रुख की आलोचना की। भारत ने उत्तर वियतनाम और वियतनामी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया। 1972 में भारत ने आधिकारिक रूप से उत्तर वियतनाम को मान्यता दी थी। भारत का रुख उस समय अंतरराष्ट्रीय नैतिकता और शांति के पक्ष में था। वियतनाम युद्ध में अमेरिका की आलोचना करके भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी स्वतंत्र और नैतिक विदेश नीति की झलक दिखाई। यह अमेरिका के लिए अप्रत्याशित था लेकिन भारत ने किया।
पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के सम्बन्ध मजबूत हुए है और इसका असर रूस की नीतियों पर देखने को मिल रहा है। किसी दौर में भारत का विश्वास बनाएं रखने के लिए पाकिस्तान को पूर्ण रूप से नजरअंदाज करने की रुसी नीति में उदारता देखी जा रही है। रूस के साथ पाकिस्तान के सामरिक सम्बन्ध भी बढ़े है। भारत और रूस के बीच रक्षा,ऊर्जा और भू-राजनीतिक मुद्दों पर ऐतिहासिक और मजबूत रिश्ते रहे हैं। भारत ने हमेशा रूस को एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में माना है और रूस के साथ उसकी साझेदारी कई दशकों से कायम है। वहीं भारत अमेरिकी रणनीतिक संबंधों से रूस आशंकित हुआ है।
रूस और अमेरिका की प्रतिद्वंदिता के बीच भारत की अपनी रणनीतिक जरूरतें है। रणनीतिक जरूरतें देश की सुरक्षा,समृद्धि,वैश्विक स्थिति और दीर्घकालिक हितों से जुड़ी होती हैं। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को अपनी भू-राजनीतिक स्थिति,आंतरिक संसाधनों,पड़ोसी देशों और वैश्विक शक्ति संतुलन को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित और बहुआयामी रणनीति अपनानी पड़ती है। अमेरिका भारत की बहुआयामी रणनीति को प्रभावित करते हुए दबाव बनाने की लगातार कोशिश कर रहा है। पहलगाम के बाद भारत पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद मिलना इसका बड़ा उदाहरण है,इसके बावजूद की भारत ने आईएमएफ के इस कदम का कड़ा विरोध किया था। अमेरिका के मुकाबले रूस भारत का विश्वसनीय साझेदार नजर आता है। रूस भारत के लिए केवल एक रक्षा साझेदार के साथ रणनीतिक,दीर्घकालिक और भरोसेमंद सहयोगी है जो भारत की सुरक्षा, ऊर्जा,कूटनीति और वैश्विक प्रभाव के लिए अनिवार्य बना हुआ है। वर्भातमान में भारत,अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ घनिष्ठ संबंध बना रहा है,लेकिन रूस के साथ उसके रणनीतिक संबंध भारत को रणनीतिक रूप से ज्यादा सक्षम बनाते हैं। रूस भारत के प्रतिद्वंदी देशों से लगती सीमा पर है और यह स्थिति भारत को रणनीतिक बढ़त देती है। रूस भारत के लिए केवल एक परंपरागत मित्र नहीं,बल्कि रक्षा,ऊर्जा,कूटनीति,तकनीक और वैश्विक प्रभाव के क्षेत्रों में एक रणनीतिक स्तंभ भी है।
भारत को अपनी सीमा सुरक्षा,पड़ोसी देशों के साथ संबंध,वैश्विक शक्ति संतुलन और आंतरिक स्थिरता के सन्दर्भ में कई भू-राजनैतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद से अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को केंद्रीय सिद्धांत बनाया था। पिछले कुछ वर्षों में भारत अमेरिका की साझेदारी से भारत के रणनीतिक स्वायत्तता बाधित हुई है। किसी भी राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति,उसके पड़ोसी, उसकी सीमाएं,संसाधन,प्राकृतिक बाधाएं और स्थानीय चुनौतियां स्थायी होती हैं। देश अपनी भौगोलिक सीमाओं को इतिहास, कूटनीति या युद्ध के माध्यम से थोड़ा बहुत बदल सकता है,पर वह अपने पड़ोसियों को नहीं चुन सकता। भारत की रणनीतिक और सुरक्षा नीति को चीन और पाकिस्तान जैसे दो पड़ोसियों के खतरे को ध्यान में रखकर ही बनाना पड़ता है। ट्रम्प आर्थिक प्रतिबद्धताओं के सहारे आइजनहावर और ओबामा को झूठला रहे है। भारत को यह समझना होगा की ट्रम्प प्रतिद्वंदिता से दबाव में आते है। वे चीन के दबाव में भी आयें जबकि यूरोप और भारत जैसे मित्र देशों से उनका कूटनीतिक व्यवहार बेहद असंगत रहा है।
जाहिर है भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए रूस जैसे साझेदार की सदा जरूरत है। अमेरिका से रणनीतिक सहयोग बढ़ाने और ट्रम्प के प्रति लचीले रहने की खुद की कूटनीति को फ़िलहाल नकारने का जोखिम भारत को उठाना ही होगा।








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