जनसत्ता
बहुस्तरीय गठबंधन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता तो रखते है,लेकिन उनका प्रभाव तभी दीर्घकालीन होता है,जब उनके पीछे साझा रणनीतिक दृष्टि,पारदर्शिता,प्रतिबद्धता और स्थायी हित हो। केवल तात्कालिक स्वार्थों पर आधारित गठबंधन अक्सर बदलती परिस्थितियों के साथ कमजोर पड़ जाते है। मक्का में तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ संयुक्त रक्षा समझौता इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसका मूल सिद्धांत है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। पहली नजर में यह इस्लामिक दुनिया में सामूहिक सुरक्षा की नई शुरुआत जैसा दिखाई देता है, लेकिन इसकी वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। इसके केंद्र में पाकिस्तान की सुरक्षा बेचैनी, तुर्की की बढ़ती रणनीतिक महत्वाकांक्षा और सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं नजर आती है।
इस नए समीकरण में तीन देशों की तीन अलग-अलग जरूरतें दिखाई देती है। तुर्की दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। ईरान के खिलाफ सऊदी अरब सुरक्षा चाहता है जबकि आर्थिक बदहाली से जूझता पाकिस्तान आर्थिक सहारा चाहता है। यही तीनों जरूरतें इस समय एक-दूसरे से जोड़ रही है। तुर्की को केवल एक मुस्लिम देश के रूप में देखना उसकी विदेश नीति को समझने में बड़ी भूल होगी। वह नाटो का सदस्य है,यूरोप का हिस्सा है,रूस के साथ रणनीतिक संबंध रखता है,ईरान से प्रतिस्पर्धा भी करता है और सहयोग भी,अरब दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाता है तथा मध्य एशिया में तुर्किक राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक शक्ति का इस्तेमाल करता है। एर्दोआन रणनीतिक स्वायत्तता चाहते है,वे किसी एक शक्ति के पीछे चलने को तैयार नहीं है। तुर्की अमेरिका से संबंध रखता है, लेकिन अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता। रूस से व्यापार करता है, लेकिन रूसी प्रभाव के अधीन नहीं होना चाहता। अरब देशों से प्रतिस्पर्धा करता है, लेकिन उन्हीं देशों की पूंजी और बाजार भी चाहता है। यह भी दिलचस्प है की तुर्की और सऊदी अरब की प्रतिद्वंदिता को दुनिया ने बखूबी देखा है, वे मध्य-पूर्व में एक-दूसरे के प्रभाव को चुनौती देते रहे है। मुस्लिम ब्रदरहुड को लेकर दोनों के बीच गहरी खाई रही है। सीरिया और मिस्र की राजनीति में दोनों के रास्ते अलग थे। कतर संकट में भी तुर्की ने दोहा का साथ दिया, जबकि रियाद उसके विरोध में खड़ा था। अब तुर्की,सऊदी अरब में रणनीतिक अवसर ढूंढ रहा है, एर्दोआन के देश में बहुत बेरोजगारी है,वे सऊदी अरब को हथियार बेचना और इस देश से भारी भरकम निवेश चाहते है।
सऊदी अरब के पास पैसा है, ऊर्जा है, धार्मिक प्रतिष्ठा है और अरब दुनिया में प्रभाव है। लेकिन स्वतंत्र सैन्य सुरक्षा क्षमता उसके लिए चुनौती का कारण बन गई है और सऊदी नेतृत्व अब इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते है। इराक युद्ध, यमन संघर्ष, ड्रोन हमले और ईरान के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने सऊदी अरब को गहरी चिंता में डाल दिया है। मोहम्मद बिन सलमान का विजन 2030, ईरान युद्द के कारण संकट में है। रियाद,तेल का साम्राज्य बनने से आगे बढ़कर पूंजी, तकनीक, धर्म और रणनीतिक शक्ति के सहारे 21वीं सदी की निर्णायक क्षेत्रीय शक्ति बनना चाहता है। सऊदी अरब ने अमेरिका से संबंध रखते हुए चीन के साथ आर्थिक संबंध बढ़ायें है, रूस से उसे कोई परहेज नहीं है तथा तुर्की तथा पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग मजबूत कर ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश की है। सऊदी अरब को तुर्की रक्षा तकनीक दे सकता है। पाकिस्तान सैन्य शक्ति और रणनीतिक प्रतिरोध का भरोसा दे सकता है। सऊदी अरब इन साझेदारियों को आर्थिक संसाधनों से मजबूती दे सकता है।
विरोधाभासों और आंतरिक चुनौतियों से घिरा पाकिस्तान अपनी विदेश नीति में बार-बार बाहरी शक्तियों का सहारा तलाशता रहा है। शीतयुद्ध के दौर में वह अमेरिका की रणनीतिक जरूरतों का महत्वपूर्ण सैन्य साझेदार बना और बदले में उसे आर्थिक सहायता, हथियार और सुरक्षा सहयोग मिला। लेकिन इस साझेदारी की कीमत भी पाकिस्तान को चुकानी पड़ी। अफगान युद्ध, कट्टरपंथ, आतंकवाद और आंतरिक अस्थिरता ने धीरे-धीरे उसके सामाजिक और सुरक्षा ढांचे को प्रभावित किया। आज पाकिस्तान एक बार फिर नए रणनीतिक समीकरणों में अपनी जगह तलाश रहा है। तुर्की और सऊदी अरब के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग उसे तत्काल आर्थिक और सामरिक लाभ दे सकता है, लेकिन इससे वह फिर किसी बड़े शक्ति-संघर्ष का संसाधन बन सकता है। पाकिस्तान की समस्या यह है कि उसकी विदेश नीति अक्सर आंतरिक कमजोरी की भरपाई बाहरी गठबंधनों से करने की कोशिश करती दिखाई देती है। अमेरिका के बाद चीन, खाड़ी देशों और अब तुर्की के साथ बढ़ती निकटता इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है पाकिस्तान की सबसे बड़ी सुरक्षा चिंता भारत है। अफगानिस्तान उसकी पश्चिमी सीमा पर चुनौती है। चीन उसका सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। अर्थव्यवस्था लगातार बाहरी सहायता और निवेश की तलाश में रहती है। ऐसे में सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए केवल धार्मिक भाई नहीं है,वह आर्थिक जीवनरेखा भी है। पाकिस्तान,सऊदी अरब का करीबी है, लेकिन ईरान का पड़ोसी भी है। वह तुर्की का मित्र है, लेकिन चीन का रणनीतिक साझेदार भी है। वह भारत के साथ प्रतिस्पर्धा करता है, लेकिन खाड़ी के देशों के साथ भारत के बढ़ते संबंधों को भी देख रहा है। पाकिस्तान इस गठबंधन से लाभ लेना चाहता है, लेकिन वह किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में उलझने के प्रति आशंकित भी रहेगा।
तुर्की,पाकिस्तान,सऊदी अरब का सबसे दिलचस्प पक्ष मुस्लिम ब्रदरहुड है। तुर्की का मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रति दृष्टिकोण और सऊदी अरब का दृष्टिकोण कभी एक जैसा नहीं रहा। तुर्की ने मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े राजनीतिक समूहों के साथ सहानुभूति दिखाई, जबकि सऊदी राजशाही ने उसे अपने लिए राजनीतिक खतरा माना। जाहिर है यह गठबंधन धार्मिक विचारधारा पर नहीं बना है। यदि मुस्लिम ब्रदरहुड वास्तव में इस गठबंधन की वैचारिक आधारशिला होता तो तुर्की और सऊदी अरब एक साथ खड़े नहीं होते। इसलिए इस गठबंधन का वास्तविक आधार इस्लाम नहीं, बल्कि अपने अपने स्वार्थ है। सऊदी अरब की ईरान से पुरानी प्रतिस्पर्धा है। तुर्की और ईरान मध्य-पूर्व में प्रभाव के लिए एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी हैं। पाकिस्तान ईरान से सीमा साझा करता है और किसी भी संघर्ष की स्थिति में सबसे कठिन स्थिति में आ सकता है। इसलिए इस नए गठबंधन के पीछे ईरान की छाया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तुर्की का सपना है कि वह फिर से मध्य-पूर्व की निर्णायक शक्ति बने। सऊदी अरब चाहता है कि अरब और मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व उसके हाथ में रहे और उसकी सुरक्षा किसी एक बाहरी शक्ति की दया पर निर्भर न हो। पाकिस्तान चाहता है कि उसकी सैन्य शक्ति और परमाणु क्षमता उसे मुस्लिम दुनिया और दक्षिण एशिया में अधिक रणनीतिक महत्व दिलाएं तथा उसकी आर्थिक कमजोरियों को खाड़ी की पूंजी और साझेदारियों से सहारा मिले।
इस उभरते सुरक्षा समीकरण को अभी नाटो जैसी संस्थागत सैन्य व्यवस्था मानना भी ठीक नहीं है। नाटो की ताकत केवल उसके सदस्य देशों की सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि साझा संस्थाओं, एकीकृत कमान संरचना, नियमित सैन्य सहयोग, स्पष्ट दायित्वों और दशकों में विकसित सामूहिक सुरक्षा की राजनीतिक प्रतिबद्धता में है। इसके विपरीत तुर्की,पाकिस्तान,सऊदी समझौते की वास्तविक मजबूती अभी भविष्य के संकटों में परखी जानी बाकी है। इस गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तीनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग है। सऊदी अरब की मुख्य चिंता ईरान और खाड़ी की सुरक्षा है, जबकि पाकिस्तान की सुरक्षा नीति का केंद्र भारत और दक्षिण एशिया है। तुर्की के हित मध्य-पूर्व से आगे काकेशस, भूमध्यसागर, रूस और नाटो तक फैले हैं। ऐसे में किसी संकट की स्थिति में तीनों की प्राथमिकताएं एक जैसी रहेंगी, यह निश्चित नहीं है। यदि ईरान के साथ संघर्ष बढ़ता है तो पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब के साथ खड़ा होना आसान नहीं होगा, क्योंकि उसकी ईरान के साथ साझा सीमा है। इसी तरह अमेरिका और तुर्की के बीच तनाव बढ़ने पर रियाद के लिए अपनी अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी और तुर्की के साथ नए संबंधों के बीच संतुलन कठिन होगा। भारत-पाकिस्तान तनाव की स्थिति भी सऊदी अरब की परीक्षा लेगी। इसलिए इस गठबंधन की असली ताकत समझौते पर हस्ताक्षर में नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने की क्षमता में तय होगी।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पाकिस्तान को तुर्की की सैन्य तकनीक और सऊदी अरब के आर्थिक संसाधनों का एक साथ लाभ मिल सकता है। तुर्की पहले से पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है और कश्मीर के प्रश्न पर उसका रुख भारत के लिए असहज रहा है। दूसरी तरफ सऊदी अरब पिछले वर्षों में भारत के साथ ऊर्जा, निवेश, व्यापार और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करता रहा है। इसलिए भारत को सऊदी अरब को यह समझाना होगा कि भारत के साथ उसकी साझेदारी उसके अपने दीर्घकालीन हितों के लिए अधिक उपयोगी है। भारत को खाड़ी में अपनी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति बढ़ानी होगी। सऊदी अरब के साथ निवेश और ऊर्जा संबंधों को और गहरा करना होगा। तुर्की के साथ कूटनीतिक संबंध बरकरार रखते हुए उसके साथ व्यावहारिक संबंधों को मजबूत करना होगा। बदलती दुनिया में गठबंधन केवल हथियारों से नहीं बनते। व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, समुद्री मार्ग और आर्थिक निर्भरता भी शक्ति के हथियार है। भारत का महत्व ऐसे में स्वत: बढ़ जाता है।
तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के रणनीतिक हित और प्राथमिकताएं अलग-अलग है,ऐसे में इसका दीर्घकालिक भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुई सुरक्षा संधि के बाद भी ईरान ने सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। पाकिस्तान ने सऊदी सुरक्षा के लिए सैन्य संसाधन भी तैनात किए, लेकिन उसने ईरान के साथ सीधे युद्ध में उतरने के बजाय मध्यस्थता का रास्ता भी खुला रखा। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के लिए ईरान के साथ सीधे युद्ध में उतरने का जोखिम नहीं लिया। उसने तेहरान के साथ संवाद और मध्यस्थता की गुंजाइश बनाए रखी। यही विरोधाभास बताता है कि यह गठबंधन कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, इसकी सीमाएं स्पष्ट है। संकट की घड़ी में राष्ट्रीय हित साझा सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर भारी पड़ सकते हैं।
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तुर्की,पाकिस्तान,सऊदी अरब-तीन देश, तीन स्वार्थ, एक गठबंधन
- by brahmadeep alune
- August 17, 2026
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