दैनिक जागरण,राष्ट्रीय
कम्युनिस्ट रूस और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के आपसी मजबूत सम्बन्ध पश्चिम को हैरान और परेशान करते रहे है,यह समस्या दशकों पुरानी है। रूस के साथ सामरिक और आर्थिक संबंध मजबूत रहने से भारत पूंजीवादी दुनिया की महत्वाकांक्षी नीतियों के शिकंजे में आने से दूर रहा है और इसी दर्द में पश्चिमी देश और अमेरिका अक्सर कराहते रहते है। यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर पश्चिम के देश भारत के रुख से खुश नहीं है क्योंकि वह अक्सर वोटिंग से बाहर रहा। यह ठीक वैसा ही है जैसे शीत युद्द के दौरान रूस की आक्रामक कूटनीति पर भारत अक्सर खामोश रहता था। भारत संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन को लेकर रूस के ख़िलाफ़ सभी बड़े प्रस्ताव और यूरोप के बड़े देश चाहते थे कि भारत रूस के ख़िलाफ़ वोट करे। वहीं पुतिन ने यूक्रेन पर हमले की घोषणा की तब से भारत का रूस से तेल आयात बढ़ता गया। जबकि पश्चिम के देश रूस पर प्रतिबंध कड़े कर रहे थे जिससे उसकी आर्थिक गतिविधियों को रोका जा सके। भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं के रिकॉर्ड आयात ने पश्चिमी प्रतिबंधों की धता बताते हुए द्विपक्षीय व्यापार को उल्लेखनीय रूप से बढ़ावा दिया। ट्रम्प इस स्थिति को बदलना चाहते है और यूक्रेन को लेकर रूस को दबाव में लाना चाहते है। वे रूस के प्रमुख सहयोगियों पर प्रतिबंधों से उन्हें डराना चाहते है। यूक्रेन पर मॉस्को द्वारा हमले के मद्देनजर रूसी कच्चे तेल के आयात में वृद्धि के लिए भारत को पश्चिम में बहुत आलोचना झेलनी पड़ी है। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शुमार रूस से यूक्रेन के बाद भारत ने सस्ता कच्चा तेल खरीदा और इसमें उस दौरान ही दस गुना वृद्धि देखी गई। इसके बाद इसमें अभूतपूर्व हुई है,जो कोयला आयात में भी देखने को मिली। रूस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक और निर्यातक है जबकि भारत विश्व का तीसरा
सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और अपनी 85 फीसद कच्चे तेल की ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में भारत ने ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक निर्णय लिया है। भारत रूसी रक्षा उद्योग के लिए एक प्रमुख बाजार है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के मुताबिक पिछले दो दशकों के दौरान मॉस्को ने भारत की पैंसठ फीसदी हथियार खरीद की सप्लाई की जिसकी कुल कीमत साठ अरब डॉलर से अधिक थी। भारत के सत्तर फीसदी से अधिक रक्षा उपकरण रूसी तकनीक या प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं। इन हथियारों और मशीनों की मेंटनेंस,सर्विसिंग के साथ उनके स्पेयर पार्ट्स को अपग्रेड करने के मामलें में भारत पूरी तरह से रूस पर निर्भर है। शीत युद्ध काल से ही रूस भारत का विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार रहा है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सोवियत समर्थन ने भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया। रूस ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का समर्थन किया,जबकि पश्चिमी देश अक्सर तटस्थ रहे।
लड़ाकू विमान मिग-21 1960 के दशक की सोवियत संघ वाली तकनीक के विमान है और भारत आज भी युद्द के मोर्चों पर इसका इस्तेमाल करता है। भारत से पास रूसी सुखोई-30 एमकेआई फाइटर प्लेन हैं। ये दुनिया के आधुनिकतम फाइटर प्लेनों में से एक हैं । रूस से ही एमआईजी-29 मिला है जो भारत के लिए दशकों से एक भरोसेमंद लड़ाकू विमान रहा है और अपग्रेड किए गए संस्करण के साथ यह अभी भी आधुनिक युद्ध आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। भारत का सबसे बड़ा और सबसे ताकतवर युद्धपोत आईएनएस विक्रमादित्य हो या ब्रह्मोस मिसाइल जैसी प्रमुख सैन्य क्षमताएं,रक्षा निर्भरता को लेकर रूस का भारत के पास कोई विकल्प नहीं है। रूस का भारत को उन्नत हथियार उपलब्ध कराना भारत की पाकिस्तान और चीन के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। भारत और रूस के बीच रक्षा,ऊर्जा और भू-राजनीतिक मुद्दों पर ऐतिहासिक और मजबूत रिश्ते रहे हैं। भारत ने हमेशा रूस को एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में माना है और रूस के साथ उसकी साझेदारी कई दशकों से कायम है। अगर रूस भारत को सामरिक मदद बंद करता है तो इसका भारत की रक्षा नीति और अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है। रूस से भारत न्यूक्लियर फ्यूल भी खरीदता है जिससे परमाणु ऊर्जा संयंत्र चलते हैं। रूस के साथ भारत का एक मजबूत सैन्य सहयोग है जिसमें सैन्य अभ्यास,प्रशिक्षण और तकनीकी साझेदारी शामिल है। ट्रम्प और पश्चिम इस स्थिति में बदलाव चाहते है,वे रक्षा उद्योग समेत अन्य सौदों में भारत के बाज़ार में अपनी मजबूती चाहते है। लेकिन भारत के लिए यह बदलाव आसान नहीं हो सकता। रूस से सहयोग खत्म या कम होने पर भारत की युद्ध क्षमता में अंतर आ सकता है। रूस से सामरिक मदद बंद होने के बाद भारत को नए साझेदारों की तलाश करनी होगी। भारत ने अमेरिका,फ्रांस और इज़राइल जैसे देशों के साथ अपनी रक्षा साझेदारी को बढ़ाया है,लेकिन इन देशों के साथ सहयोग में भी राजनीतिक और सामरिक जटिलताएं हो सकती हैं। इन देशों से भारत को समान स्तर की मदद मिल पाना मुश्किल हो सकता है,क्योंकि प्रत्येक देश की अपनी प्राथमिकताएं और सीमाएं होती हैं। रूस के साथ सामरिक मदद समाप्त होने से भारत की स्थिति पर वैश्विक स्तर पर भी असर पड़ सकता है।
रूस की हथियार कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट भारत के साथ मिलकर तीसरे देशों को हथियार बेचने की तैयारी में है । रूस अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) का विस्तार करने का भी इच्छुक है। यह एक सड़क,समुद्र और रेल परियोजना है जो ईरान के जरिए रूस को भारत से जोड़ती है। रूस आईएनएसटीसी के माध्यम से कोयले की एक खेप भी भेज चूका है। यह परियोजना दो दशकों से अधिक समय से चल रही है और पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस को जिन बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है,उसके कारण आईएनएसटीसी अब क्रेमलिन के लिए एक प्रमुख व्यापार प्राथमिकता है। चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग भी एक और परियोजना है जो अहमियत रखती है। रूस के पूर्वी क्षेत्र से करीब दस हजार किलोमीटर तक फैला समुद्री मार्ग,भारत में रूसी ऊर्जा और अन्य कच्चे माल के सुरक्षित प्रवाह में मदद कर सकता है। प्रस्तावित परियोजना से स्वेज नहर के मौजूदा मार्ग की तुलना में शिपिंग समय चालीस दिनों से घटकर चौबीस दिन रह जाने की उम्मीद है।
शीत युद्द के दौर में रूस की अमेरिका और चीन से समान दूरी थी। उस दौरान मॉस्को ने वाशिंगटन और बीजिंग के खिलाफ अपनी समग्र रणनीति तैयार की थी और गुटनिरपेक्षता के कारण नई दिल्ली के साथ अपेक्षाकृत सम्बन्ध बहुत मजबूत रहे। अब दुनिया बदल गई है और भारत के प्रमुख प्रतिद्वंदी चीन के साथ रूस के सम्बन्ध बेहद मजबूत हुए है। चीन रूस का ऊर्जा और तेल का बड़ा बाज़ार है वहीं चीन ने भी रूस के बाज़ार में अपनी स्थिति को बहुत मजबूत कर लिया है। चीन का पाकिस्तान एक अहम रक्षा और आर्थिक साझेदार है। अभी तक रूस की उपस्थिति और सहयोग भारत के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंदियों पर दबाव का काम करती थी। भारत के पास अपनी सैन्य और भूराजनैतिक स्थिति को सुधारने और संतुलित रखने की क्षमता है जो रूस के समर्थन से मजबूत दिखाई पड़ती थी। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान रूस की कूटनीति ने बेहद संतुलित होकर व्यवहार किया और इस पर चीन का साफ दबाव दिखाई दिया। ट्रम्प की टैरिफ और दबाव नीति भारत की रणनीतिक चुनौतियों को बढ़ा रही है। वहीं रूस भारत सम्बन्धों में उम्मीदों के बाद आशंकाएं भी गहराने लगी है। रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव और पुतिन क्वाड के विरोध में खुलकर बोलते रहे है वे इसे चीन और भारत के बीच तनाव बढ़ाने की पश्चिम की कोशिश कहते है। भारत की भौगोलिक स्थिति,सीमा विवाद,बदलता वैश्विक परिदृश्य उसे कई रक्षा और रणनीतिक चुनौतियों के सामने लाता है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को बहुपक्षीय सहयोग की आवश्यकता है और इसमें रूस की भूमिका सदा महत्वपूर्ण रही है। लेकिन चीन की चुनौती भारत के लिए सबसे बड़ी है और यह चिंता भारत को स्वाभाविक तौर पर पश्चिम और अमेरिका से सम्बन्ध संतुलित रखने पर मजबूर करती है।
ट्रम्प की भारत को लेकर नीतियां निश्चित ही परेशान करने वाली है लेकिन भारत रुको और देखो की रणनीति अपनाकर इसका रणनीतिक लाभ उठा सकता है। बड़े उपभोक्ता वर्ग वाले देश केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं,बल्कि रणनीतिक,सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से भी महाशक्तियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि ऐसी महाशक्तियां इन देशों के साथ व्यापार, कूटनीति और रक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिश करती हैं। दुनिया का सबसे बड़ा मध्यमवर्गीय वर्ग भारत में है,चीन का काउन्टर करने के लिए अमेरिका और यूरोप को भारत की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए जरूरत हमेशा पड़ेगी। वहीं अंतरिक्ष,मेडिकल,विज्ञान और तकनीक में भारतीय दक्षता का नासा और यूरोप में बड़ा प्रभाव है। भारत की रणनीतिक,आर्थिक और राजनैतिक महत्ता और उपयोगिता रूस,अमेरिका और पश्चिम के लिए सदा बना रहेगी। जाहिर है भारत वर्तमान परिस्थितियों में भी नियन्त्रण और संतुलन की कूटनीति पर कायम रहे ।







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