लैटिन अमेरिका का भविष्य
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लैटिन अमेरिका का भविष्य

जनसत्ता
 मेक्सिको,मध्य अमेरिका,कैरिबियन और दक्षिण अमेरिका के कई देशों तक फैला हुआ लैटिन अमेरिका संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से भौगोलिक रूप से जुड़ा हुआ है, इसकी स्थिरता और सुरक्षा अमेरिका के राष्ट्रीय हितों से जुड़ी है। यह अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है और विदेशी निवेश का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। लैटिन अमेरिका के कई देशों की वैचारिक प्रतिबद्धताएं पूंजीवाद के खिलाफ रही है,इसका असर राजनीतिक परिस्थितियों पर पड़ा है,यहीं कारण है की ऐसे कुछ देशों से संयुक्तराष्ट्र अमेरिका,अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित रहा है।  वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरों को बंदी बनाने की अमेरिकी कार्रवाई के पीछे पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच गहरे मतभेद है,वहीं अब इस संकट के और आगे बढ़ने की भी आशंका है।
किसी देश के मौजूदा राष्ट्रपति के खिलाफ प्रत्यक्ष कार्रवाईसे यह संदेश गया है कि महाशक्तियां अब परंपरागत कूटनीतिक सीमाओं से आगे जाकर दबाव बनाने को तैयार हैं। इससे लैटिन अमेरिका समेत दुनिया के कई छोटे और मध्यम देशों में यह डर पैदा हुआ कि उनकी राजनीतिक संप्रभुता भी बाहरी शक्तियों के निर्णयों से प्रभावित हो सकती है।रूस,चीन और कुछ विकासशील देश इसे सत्तापरिवर्तन की राजनीतिके रूप में देख रहे है जबकि  अमेरिका और उसके सहयोगी इसे लोकतंत्र या मानवाधिकारों के नाम पर उचित ठहरा रहे है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पहले से मौजूद विभाजन और गहरा ही गया है तथा अंतरराष्ट्रीय कानून और राजनयिक सुरक्षा कमजोर पड़ गई है।यहवैश्विक अस्थिरता की सबसे बड़ी वजह बन सकती है।
लैटिन अमेरिका,अमेरिका के लिए सुरक्षा,अर्थव्यवस्था और वैश्विक शक्ति-संतुलन का एक अहम क्षेत्र है। अमेरिका इस समूचे क्षेत्र पर नियंत्रण रखना चाहता है। लेकिन वेनेजुएला,क्यूबा,निकारागुआ,कोलम्बिया,ब्राज़ील,अर्जेंटीना,मेक्सिको, चिली और पेरू जैसे देशों ने रूस और चीन पर ज्यादा भरोसा दिखाया है। इससे अमेरिका असहज  रहता  है।दूसरी और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बाद भी लैटिन अमेरिकी देशों में गरीबी,बेरोजगारी और अपराध एक बड़ी समस्या है। अधिकांश देशों में राजनीतिक अस्थिरता,शासन का कुप्रबन्धन और सत्तावादी ताकतों की लामबंदी से लोग बेहाल है,जो पलायन करके अमेरिका में बसना बेहतर विकल्प मानते है।इस क्षेत्र की बड़ी समस्या आर्थिक असमानता भी है। समाज का एक छोटा वर्ग अत्यधिक संपन्न है,जबकि बड़ी आबादी गरीबी,बेरोज़गारी और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। भूमि और संपत्ति का असमान वितरण हिंसा को बढ़ावा देता रहा है।असमानता के कारण युवा अपराध और तस्करी की और रुख कर लेते है।कोलंबिया,मैक्सिको और मध्य अमेरिका में ड्रग कार्टेल न केवल कानून-व्यवस्था को बल्कि पूरे राज्य को चुनौती देते हैं। इससे आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में रहती है।राजनीतिक अस्थिरता,अवैध प्रवासन,नशीली दवाओं की तस्करी और हिंसा सीधे अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करती है। इसी वजह से अमेरिका इस क्षेत्र को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है।हालांकि,लोकतांत्रिक लैटिन अमेरिकी देशों और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंध आम तौर पर अच्छे थे। फिर भी,संयुक्त राज्य अमेरिका कुछ लैटिन अमेरिकी देशों की लोकतंत्र की कमी या मादक पदार्थों के खिलाफ पर्याप्त उपाय न करने के लिए आलोचना करता है।
लैटिन अमेरिका तेल,गैस,लिथियम,तांबा,सोया,कॉफी और कृषि उत्पादों से समृद्ध है। अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों के अरबों डॉलर के निवेश इस क्षेत्र में लगे हैं,जिन्हें सुरक्षित रखना उसकी प्राथमिकता है।पिछले कुछ वर्षों मेंचीन ने भारी निवेश,ऋण और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के जरिए इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ा लिया है।जबकि रूस सैन्य और ऊर्जा सहयोग के माध्यम से इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों को प्रभावित करता रहा है।बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और कच्चे माल की चाह ने चीन को अर्जेंटीना,ब्राज़ील और वेनेजुएलाके प्रमुख व्यापारिक भागीदार के रूप में स्थापित किया है। चीनी कंपनियां  ऊर्जा,बुनियादी ढांचा,मोबाइल नेटवर्क और तकनीक में निवेश कर रही हैंऔर कई देशों को लीज़ ऑफ क्रेडिटऋण प्रदान करती हैं जो स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। इससे कई  देशों का चीन की ओर झुकाव बढ़ा है और चीन को सामरिक एवं आर्थिक प्रभाव मिला है।
लैटिन अमेरिका में चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी को रोकना डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति की एक बड़ी प्राथमिकता रही है। ट्रम्प प्रशासन को आशंका है  कि चीन की आर्थिक घुसपैठ और रूस की सैन्य तथा राजनीतिक सक्रियता अमेरिका की सुरक्षा,व्यापार और भू-राजनीतिक वर्चस्व को कमजोर कर सकती है।लैटिन अमेरिका के कई देशों चीन पर बढ़ती आर्थिक निर्भरता भविष्य में रणनीतिक निर्भरता में बदल सकती है। अमेरिका इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से अपने रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता आया है,इसलिए किसी बाहरी महाशक्ति की सक्रियता उसे सीधे चुनौती देती है। चीन अब केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं है,बल्कि वह सैटेलाइट ट्रैकिंग स्टेशन,साइबर निगरानी केंद्र,बंदरगाहों और सैन्यउपयोगी बुनियादी ढांचे के जरिए अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। अमेरिका को डर है कि ये सुविधाएं भविष्य में जासूसी,नौसैनिक संचालन और मिसाइल निगरानी के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं।चीन की इस क्षेत्र में मौजूदगी से अमेरिका की दक्षिणी कमान और उसके सैन्य ठिकानों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। यदि चीन को क्यूबा,वेनेजुएला या निकारागुआ जैसे देशों में स्थायी रणनीतिक पहुंच मिल जाती है,तो अमेरिका अपने ही पड़ोस में एक प्रतिद्वंद्वी शक्ति से घिरा महसूस करेगा। यह स्थिति शीत युद्ध के दौरान सोवियत मिसाइल संकट जैसी आशंकाओं को जन्म देती है।ताइवान या एशियाप्रशांत क्षेत्र में किसी टकराव की स्थिति में चीन लैटिन अमेरिका में अपने ठिकानों का उपयोग अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए कर सकता है। इस प्रकार चीन की लैटिन अमेरिका में बढ़ती हैसियत अमेरिका की वैश्विक रणनीतिक बढ़त को कमजोर करने की क्षमता रखती है। चीन का सहयोगी और अमेरिका का कड़ा सामरिक प्रतिद्वंदी रूस वेनेजुएला,क्यूबा और निकारागुआ जैसे देशों के साथ सैन्य सहयोग,हथियार आपूर्ति और खुफिया साझेदारी बढ़ा रहा है,जो सीधे अमेरिकी सुरक्षा हितों को चुनौती देता है।अमेरिका ने इस बढ़ती चुनौती का जवाब आर्थिक दबाव,प्रतिबंधों और कूटनीतिक सक्रियता से देने की कोशिश की है। वेनेजुएला पर कठोर प्रतिबंध,क्यूबा पर सख्ती और क्षेत्रीय सहयोगियों पर दबाव इसी रणनीति का हिस्सा है।
लैटिन अमेरिका में अमेरिका,रूस और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंदिता आने वाले वर्षों में इस पूरे क्षेत्र की राजनीति,अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संरचना को गहराई से प्रभावित कर सकती है। यह प्रतिस्पर्धा निवेश,तकनीक,हथियार,कूटनीति और संसाधनों से आगे निकल कर युद्द जैसी स्थिति तक जा सकती है।इसका असर आम जनता पर पड़ेगा। यदि देशों को किसी एक गुट को चुनने के लिए मजबूर किया गया तो राजनीतिक अस्थिरता,प्रतिबंध और आर्थिक संकट गहराएंगे। हालांकि कुछ सरकारें इस प्रतिद्वंदिता का उपयोग बेहतर सौदे और निवेश हासिल करने के लिए भी कर सकती हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह प्रतिस्पर्धा लैटिन अमेरिका के लिए अवसर से अधिक जोखिम लेकर आती दिखती है।
लैटिन अमेरिका को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प की नीति में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर वे इस क्षेत्र में चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते रहे,लेकिन दूसरी ओर उन्होंने ऐसे कदम उठाए जिनसे अमेरिका की अपनी विश्वसनीयता और प्रभाव कमजोर हुआ है।ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिका फर्स्टके नाम पर व्यापार समझौतों पर पुनर्विचार किया,विदेशी सहायता में कटौती की और कई लैटिन अमेरिकी देशों के साथ संवाद की जगह दबाव और दंड की नीति अपनाई। इससे अमेरिका के पारंपरिक साझेदारों मेक्सिको,कोलंबिया और कई मध्य अमेरिकी देशों में असंतोष बढ़ा। अमेरिका का दबाव करने के लिए जब इन देशों ने दूसरे साझेदारों की तलाश की तो चीन ने निवेश,ऋण और बुनियादी ढांचे के माध्यम से खुद को स्थापित कर लिया।ट्रम्प लोकतंत्र और मानवाधिकार की बात करते हुए वेनेजुएला,क्यूबा और निकारागुआ पर दबाव बना रहे है लेकिन साथ ही कुछ सत्तावादी सरकारों से रणनीतिक लाभ के लिए नरमी भी बरतते रहे है। इससे अमेरिका की नैतिक स्थिति कमजोर हुई है।ट्रम्प की नीति में चीन और रूस को रोकने की इच्छा तो है,लेकिन उसे लागू करने के लिए सकारात्मक कूटनीति,आर्थिक साझेदारी और क्षेत्रीय विश्वास निर्माण का अभाव रहा है।
लैटिन अमेरिका में ट्रम्प की कठोर और दबावआधारित नीतियां तथा यूरोप की ख़ामोशी मिलकर एक खतरनाक स्थिति बना रही है। यूरोप ने लोकतंत्र और मानवाधिकार की बात तो की है लेकिन सक्रिय राजनीतिक या आर्थिक हस्तक्षेप से परहेज किया है। ट्रम्प का लक्ष्य यदि इस क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता को कम करना है,तो संवाद,कूटनीति और आर्थिक साझेदारी सबसे प्रभावी रास्ते होते हैं। लेकिन ट्रम्प की नीति इसके उलट है और वे कई देशों पर प्रतिबंध,धमकी और दबाव का इस्तेमाल कर रहे है। इससे लैटिन अमेरिकी देशों के राष्ट्रवादी और सत्तावादी तत्वों को मजबूती मिली है और आम जनता में अमेरिका के प्रति अविश्वास बढ़ा है जिससे लोकतंत्र और सुधारों के पक्ष में खड़े समूह कमजोर हो रहे है।यदि ट्रम्प प्रशासन राजनीतिक सुधार,चुनावी प्रक्रियाओं और आर्थिक सहयोग पर आधारित संवाद की नीति अपनाता है तो वह स्थानीय समाज और विपक्षी शक्तियों को अधिक प्रभावी समर्थन दे सकता है। लेकिन ताकत और दंड का रास्ता यह संदेश देता है कि अमेरिका समाधान नहीं,बल्कि नियंत्रण चाहता है।
लैटिन अमेरिका में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता के प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ सकते है। यह क्षेत्र ऊर्जा,खनिज,कृषि और समुद्री व्यापार मार्गों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यहां सरकारें कमजोर होती हैं या लगातार सत्ता परिवर्तन और हिंसा होती है,तो वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती हैं। तेल, तांबा,लिथियम और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतारचढ़ाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकता है। इससे और ज्यादा अस्थिरता बढ़ सकती है। वेनेजुएला,हैती और मध्य अमेरिका जैसे देशों से पहले ही लाखों लोग अमेरिका और अन्य देशों की ओर पलायन कर रहे हैं। अस्थिरता बढ़ने पर यह प्रवाह और तेज होगा,जिससे अमेरिका,यूरोप और पड़ोसी देशों पर सामाजिक व राजनीतिक दबाव बढ़ेगा। इसका राजनीतिक फायदा अपराधी गिरोह,ड्रग कार्टेल और बाहरी शक्तियां उठा सकती हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय नशीली दवाओं की तस्करी,हथियारों का व्यापार और साइबर अपराध बढ़ सकते हैं।लैटिन अमेरिका की अस्थिरता दुनिया भर की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।ट्रम्प की आक्रामक नीतियों से यह महाशक्तियों की प्रतिद्वंदिता का नया मैदान बन सकता है,जो दीर्घकालिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है।

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