पीपुल्स समाचार
विश्व के शीर्ष नेताओं की सुरक्षा से जुड़े हैरतअंगेज़ किस्से दुनिया के सामने आते रहे है। व्लादिमीर पुतिन,अपनी सुरक्षा को लेकर हमेशा बेहद सतर्क रहते है। जासूसी और स्वास्थ्य की गोपनीयता बनाए रखने के लिए उनके अंगरक्षक उनका मल-मूत्र तक एक विशेष सूटकेस में भरकर रूस वापस ले जाते है। इसके साथ ही उन पर सार्वजनिक आयोजनों में हमशक्ल का इस्तेमाल करने के दावे भी किए जाते हैं। लीबिया के पूर्व नेता गद्दाफी अपनी सुरक्षा को लेकर इतने चौकन्ने रहते थे कि वे अंतिम समय तक किसी को यह नहीं बताते थे कि वे किस हवाई जहाज से यात्रा कर रहे हैं और कहां उतरने वाले है। कई बार वे सुरक्षा कारणों से अचानक मार्ग और कार्यक्रम बदल देते थे। उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन जब भी किसी विदेशी दौरे पर जाते है तो वे अपनी ट्रेन में एक विशेष पोर्टेबल टॉयलेट साथ लेकर चलते है जिससे किसी भी विदेशी एजेंसी को उनके जैविक नमूने न मिल सकें।
लेकिन सुरक्षा को लेकर जितनी भी कहानियां दुनिया ने सुनी हो,कूटनीति के इतिहास में यह दृश्य बेहद असामान्य और प्रतीकात्मक माना जाएगा कि किसी विदेशी मेहमान ने मेज़बान देश द्वारा दिए गए उपहारों को ही संभावित खतरे की तरह देखकर कूड़ेदान में फिंकवा दिया हो। ट्रम्प की चीन यात्रा के दौरान यही हुआ। अमेरिकी स्टाफ ने चीनी अधिकारियों द्वारा दिए गए क्रेडेंशियल्स, डेलिगेशन पिन, अस्थायी फोन और अन्य वस्तुओं को एयर फोर्स वन में रखने के बजाय डस्टबिन में डाल दिया। जब कोई देश किसी विदेशी नेता का विशेष उपहार देकर स्वागत करता है तो वह यह दिखाना चाहता है कि उसके लिए इन संबंधों का कितना महत्व है और वह कूटनीति को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाना चाहता है। इसके पीछे सम्मान,मित्रता,सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक संकेत भी होते है। लेकिन जब अमेरिकी स्टाफ ने चीन से मिले कुछ सामानों को डस्टबिन में फेंक कर यह संकेत भी दिया कि अमेरिका अब चीन की कूटनीतिक मेहमाननवाज़ी के पीछे छिपे किसी भी संभावित रणनीतिक उद्देश्य पर आंख मूंदकर भरोसा करने को तैयार नहीं है। इस तरह उपहार जो सामान्यतः मित्रता और विश्वास के प्रतीक माने जाते है,वही उस घटना में अविश्वास और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के प्रतीक बन गए। उपहारों को इंटेलिजेंस टूल के रूप में देखने का यह नजरिया आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरा असर डाल सकता है।
ट्रम्प की बीजिंग यात्रा की शुरुआत जितनी भव्य,सुनियोजित और प्रतीकात्मक दिखाई गई,उसका अंत उतना ही कटु,संशयपूर्ण और अविश्वास से भरा नजर आया। चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति के स्वागत में अपनी पूरी कूटनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति झोंक दी। लाल कालीन,सैन्य सम्मान,पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल की भव्यता के माध्यम से बीजिंग ने यह दिखाने की कोशिश की थी की वह अमेरिका के साथ टकराव नहीं,बल्कि सम्मानजनक प्रतिस्पर्धा चाहता है। लेकिन इस चमकदार सतह के नीचे दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा था कि मुस्कुराती तस्वीरें भी उसे छिपा नहीं सकी। ट्रम्प और उनके सुरक्षा सलाहकारों को यह भय था कि चीन द्वारा दिए गए उपहारों में जासूसी उपकरण,माइक्रोचिप या निगरानी तकनीक छिपी हो सकती है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते साइबर युद्ध,तकनीकी जासूसी और डेटा सुरक्षा विवादों के दौर में यह डर पूरी तरह असामान्य भी नही है। ट्रम्प के लिए चीन ऐसा व्यापारिक और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है जो तकनीक, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला,सैन्य शक्ति और साइबर क्षमताओं के माध्यम से अमेरिका की वैश्विक श्रेष्ठता को चुनौती दे रहा है। उनकी यात्रा के दौरान व्यापार घाटा, टैरिफ,सेमीकंडक्टर तकनीक,कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बौद्धिक संपदा की चोरी जैसे मुद्दे बातचीत के केंद्र में रहे। लेकिन इन विषयों पर कोई निर्णायक सहमति नहीं बन सकी।
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका लगातार चीन पर अमेरिकी कंपनियों की तकनीक चोरी करने,साइबर हैकिंग करवाने और संवेदनशील सूचनाओं तक पहुंच बनाने के आरोप लगाता रहा है। हुआवेई जैसी चीनी कंपनियों पर अमेरिका ने यही आरोप लगाते हुए प्रतिबंध लगाएं कि उनके उपकरणों के माध्यम से चीन वैश्विक स्तर पर डेटा और संचार नेटवर्क पर निगरानी स्थापित कर सकता है। ऐसे माहौल में ट्रम्प का उपहारों को लेकर संशय स्वभाविक दिखाई पड़ता है। ट्रम्प का नजरिया वैश्विक राजनीति के उस नए युग का प्रतीक बन गया जिसमें कूटनीतिक उपहार भी सुरक्षा संदेह से मुक्त नहीं रहे। दोनों देशों के बीच यह प्रतिस्पर्धा अब इतनी गहरी हो चुकी है कि राजनयिक शिष्टाचार,सांस्कृतिक समारोह और औपचारिक मुस्कानें भी उस तनाव को ढकने में नाकाम रही।
अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को लंबे समय से यह आशंका रही है कि चीन कूटनीतिक आयोजनों,तकनीकी उपकरणों और संचार माध्यमों के जरिए संवेदनशील सूचनाएं हासिल करने की कोशिश कर सकता है। इसलिए ट्रम्प प्रशासन के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल और भी कठोर कर दिए गए थे। अमेरिकी स्टाफ यह जोखिम लेने को तैयार नहीं था कि किसी अस्थायी फोन,डिजिटल कार्ड या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में ट्रैकिंग सिस्टम,डेटा संग्रहण तकनीक या माइक्रो चिप छिपी हो सकती है। यही कारण था कि इन वस्तुओं को स्मृति चिह्न की तरह संभालकर रखने के बजाय संभावित सुरक्षा खतरे की तरह देखा गया।
यह दृश्य अपने आप में आधुनिक कूटनीति के बदलते चरित्र को उजागर करता है। एक समय था जब विदेशी यात्राओं में मिले उपहार और प्रतीकात्मक वस्तुएं मित्रता और सम्मान का संकेत मानी जाती थी,लेकिन अब वही वस्तुएं साइबर जासूसी और निगरानी के शक के घेरे में आ चुकी हैं। ट्रम्प की बीजिंग यात्रा से अमेरिका और चीन दोनों को बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक उम्मीदें थीं। अमेरिका चाहता था कि चीन व्यापार घाटा कम करें,अमेरिकी कंपनियों के लिए बाजार खोले और बौद्धिक संपदा चोरी जैसे मुद्दों पर सख्त कदम उठाएं। वहीं चीन को उम्मीद थी कि यह यात्रा बढ़ते तनाव को कम करेगी और दोनों देशों के बीच सहयोग का नया माहौल बनेगा। वैश्विक स्तर पर भी माना जा रहा था कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच स्थिर संबंध अंतरराष्ट्रीय व्यापार और रणनीतिक संतुलन के लिए सकारात्मक साबित होंगे। लेकिन अंततः अविश्वास सहयोग पर भारी पड़ गया। ट्रम्प की चीन यात्रा इतिहास में कूड़ेदान की कूटनीति का प्रतीक बन गई है, जहां कूटनीतिक उपहार भी गहरें अविश्वास के बोझ तले दब गए।








Leave feedback about this